Constipation : कब्ज हीं नहीं अनेक रोगों का दुश्मन है यह फल, जानें कैसे
Constipation : This fruit is the enemy of not only constipation but many diseases, know how

Constipation : अमरूद स्वादिष्ट होने के साथ-साथ स्वास्थ्यवर्द्धक भी होता है। अमरूद में विटामिन ‘सी‘ की मात्रा बहुत अधिक होती है। इसको अंग्रेज़ी में ‘ग्वावा‘ के नाम से जाना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसकी उत्पत्ति ‘दक्षिण अमेरिका‘ मानी जाती है। 17 वीं शताब्दी के आस-पास इसका आगमन भारत में हुआ था।
अमरूद के संबंध में महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक ‘डायट एण्ड डायट रिफाम्र्स‘ में लिखा है-’कर्नल शमशेर सिंह ने मुझे अमरूद के विषय में बताया था क्योंकि मैं कुछ समय से अमरूद और अमरूद के बीजों के विषय में जानकारी प्राप्त करने का इच्छुक था। अपनी परिस्थितियों में उनसे जो कुछ जान सका था, वह यह है कि अमरूद के बीज बिना चबाये निगल लिये जाते हैं, संभवतः इस कारण कि इससे पेट साफ (Clean Stomach Tips) होता है। कुछ स्थानीय चिकित्सा करने वालों ने मुझे बताया कि बीज में भी कार्डियाक टाॅनिक (Cardiac Tonic) होता है जो हृदय को पुष्टता प्रदान करता है।‘
अमरूद के बीजों की अलग ही माया है। जब हम अमरूद खायें तो बीजों को चबाना नहीं चाहिए बल्कि उनको निगल जाना चाहिए। इससे वे पेट में पहुंचकर आंतों में चिपके पुराने मल को अपने में लपेट लेते हैं और मल के साथ (Constipation ) निकल जाते हैं
अपनी पुस्तक ‘फूड्स फाॅर गुड हेल्थ एण्ड हीलिंग‘ में डाॅ. इटंली डी ओवेर जेने राइट ने बड़ी महत्त्वपूर्ण बात को कहने में गर्व की अनुभूति करते हुए कहा है कि -’फ्लोरिडा में अमरूद को गरीबों का फल कहा जाता है। अमरूद के बीजों की अलग ही माया है। जब हम अमरूद खायें तो बीजों को चबाना नहीं चाहिए बल्कि उनको निगल जाना चाहिए। इससे वे पेट में पहुंचकर आंतों में चिपके पुराने मल को अपने में लपेट लेते हैं और मल के साथ (Constipation ) निकल जाते हैं। इस तरह ये बीज पेट की शुद्धि में बहुत ही सहायक होते हैं।‘‘
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बीजों का स्वास्थ्य के लिये महत्त्व
इससे यह स्पष्ट होता है कि इन बीजों का स्वास्थ्य के लिये काफी महत्त्व होता है। अमरूद के बीजों को निगलने पर पेट की शुद्धि होती है जबकि इन्हें चबाकर खाने से हृदय को पुष्टता मिलती है। पेरू तथा सोवियत संघ के कुछ चिकित्सा अनुसंधानकर्ताओं ने इन्हें हृदय रोगियों के लिए हितकर ठहराया है और कई रोगियों पर आज़माया भी है।
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कब्ज़ को दूर करता है (Constipation )
आयुर्वेद के अनुसार अमरूद स्वादिष्ट, कसैला, मीठा, वीर्यवर्द्धक, शीतल प्रकृति वाला, पित्तशामक और रूचिकर होता हैं। यह दाह, भ्रम, मूच्र्छा और प्यास को दूर करने वाला तथा कृमिघ्न है। यह उन्माद के रोग में भी आरामदायक है और कब्ज़ को दूर करता है।
कब्ज के लक्षण — Symptoms of Constipation
- भूख कम लगना।
- थोड़ी थोड़ी देर में सिरदर्द होना।
- सांस से बदबू आना।
- नाक का लगातार बहना।
- चेहरे पर मुहासे निकल आना।
- पेट में गैस बनना।
- चक्कर आना।
- जी मिचलाना।
- पेट लगातार भारी रहना।
- हाजमा खराब होना।
- आंखों में जलन होना।
- कमजोरी महसूस होना।
- शौच के बाद भी पेट साफ न होना।
- पेट में मरोड़ पड़ना।
- कमर दर्द होना।
- मुंह में छाले होना।
- जीभ का रंग सफेद या मटमैला हो जाना।
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भूख को बढ़ाने वाला फल (Constipation )
यूनानी मतानुसार यह पहले दर्जे में ठंडा, तर तथा दूसरे दर्जे में उष्ण प्रकृति वाला होता है। यह बलकारी, मृदु, मन को प्रसन्न रखने वाला, भूख को बढ़ाने वाला, पाचक, हृदय को शक्ति देने वाला, मस्तिष्क को बल प्रदान करने वाला होता है। मीठा अमरूद पेचिश ( Dysentery) में लाभदायक होता है। भोजन के बाद लेने से यह मृदु विरेचन का भी काम करता है।
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डाल पर पके फलों को खाना चाहिए (Constipation)
अमरूद के ऐसे ही फलों को खाना चाहिए जो डाल पर पके हों। उस पर सादा नम़क, काला नमक, काली मिर्च, जलजीरा पाउडर डालकर खाने से स्वादिष्ट हो जाता है। कई व्यक्ति इसकी सूखी व रसेदार सब्ज़ी भी बनाते हैं। टाॅफी, जैली, मुरब्बा, सलाद आदि के रूप मं भी अमरूद का प्रयोग किया जाता है।
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छोटी-बड़ी बीमारियों के उपचार के लिए
अमरूद का प्रयोग छोटी-बड़ी बीमारियों के उपचार के लिए भी नुस्खों के रूप में किया जाता है। ग्रामीण जन अनेक बीमारियों में इसका उपयोग इस प्रकार करते हैं।
- सर्दी या पुराना ज़ुकाम होने पर पके हुए अमरूद को इच्छानुसार भरपेट खा कर बिना पानी पीये रात भर बिता देने पर सुबह होते-होते काफी राहत मिलती है।
- कब्ज़ (Constipation ) के रोगी कुछ दिनों तक सलाद में सिर्फ पका अमरूद, मूली, गाजर एवं पुदीने की पत्तियों का ही इस्तेमाल करें तो कब्ज की शिकायत प्रायः दूर हो जाती है।
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- अमरूद के कोमल पत्तों का काढ़ा बनाकर काली मिर्च डालकर उसे पीते रहने से बुखार दूर हो जाता है।
- अमरूद को चबाकर खाने या भरपूर मात्रा में रस पीने से बहुत लाभ होता है क्योंकि इसके 100 मि. ली. रस से लगभग 70 से 170 मि. ग्राम तक विटामिन ‘सी‘ प्राप्त होता है। रक्तविकार तथा रक्तपित्त में इसका रस अत्यंत लाभकारी होता है।



