Tongue Health : शरीर के अनेक रोगों को बता देती है जीभ, जानें लक्ष्ण

Tongue Health: Tongue tells about many diseases of the body, know the symptoms

Tongue Health: Tongue tells about many diseases of the body, know the symptoms
Tongue Health: Tongue tells about many diseases of the body, know the symptoms

मानव शरीर एक जटिल कम्प्यूटर की तरह है। इसकी जटिलता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि आदि काल से आज तक मनुष्य द्वारा लगातार किये जा रहे शोधों के बावजूद आज तक शरीर के संपूर्ण क्रियाकलापों की पूरी जानकारी प्राप्त नहीं की जा सकी है। जब शरीर पूरी तरह स्वस्थ होता है, उस समय उसके अंग-प्रत्यंगों का कार्य पूरी क्षमता से चलता रहता है लेकिन रोग के प्रवेश करते ही अनेक अंग-प्रत्यंग रोग का संकेत देने लगते हैं।

चिकित्सक के पास जब रोगी जाता है तब चिकित्सक रोग की जानकारी कई तरह से करता है। इसके अन्तर्गत चेहरा, नब्ज़ देखकर, स्टैथस्कोप द्वारा, आंखों को देखकर तथा जीभ को देखकर या उससे हाल-चाल पूछकर चिकित्सक रोगी की स्थिति ज्ञात करते हैं।

आखिर इन सब तरीकों से कैसे रोग की जानकारी प्राप्त हो जाती है, यह आम लोगों के लिए प्रायः कौतुहल का विषय रहता है। जीभ एक ऐसा अंग है जो विभिन्न रोगों में कई स्थिति से रोग की जानकारी दे देती है।

जीभ के लक्षणों के अनुसार बीमारी की जानकारी निम्नानुसार होती हैः

दमा एवं हृदय रोग मेंः- अगर रोगी दमा का शिकार है या वह हृदयरोग से पीड़ित है तो उस रोगी की जीभ बैंगनी रंग की हो जाती है। जब चिकित्सक जीभ का रंग बैगनी देखते हैं तो अन्य लक्षणों के साथ यह तय कर लेते हैं कि रोगी दमा या हृदय रोग का शिकार है।

मलेरिया बुखार मेंः- बार-बार ठंड लगकर बुखार आने के साथ ही जीभ सूखकर सफेद हो जाती है तथा उसके किनारे लाल हो जाते हैं। जीभ में सबसबाहट का होना भी प्रारंभ हो जाता है।

कफ-रक्त विकृति मेंः- जब रोगी कफ एवं रक्त की विकृति से बीमार हो जाता है तो उसकी जीभ स्वादहीन हो जाती है अर्थात् जीभ को किसी भी प्रकार का स्वाद महसूस नहीं होता।

निमोनिया मेंः- निमोनिया बुखार की स्थिति में जीभ हमेशा कांपती रहती है तथा बार-बार मुंह से बाहर निकलने की कोशिश करती रहती है।

यौन रोगों मेंः- महिला एवं पुरूष जब किसी भी प्रकार के यौन रोग से पीड़ित हो जाते हैं तो उनकी जीभ स्याह हो जाती है तथा जीभ पर दरार पड़ने जैसा निशान बनकर वह शुष्क हो जाती है।

कमजोरी मेंः- रोगी जब किसी बीमारी या अन्य कारणों से अत्यन्त दुर्बल हो जाता है तो उसकी जीभ लंबी हो जाती है और प्रायः होठों को तर करने में लगी रहती है। रोगी का गला बार-बार सूखने लगता है।

पीलिया मेंः- किसी भी कारण से रक्त में रक्ताणुओं की कमी होने से या पीलिया (जौण्डिस) होने की स्थिति में रोगी की जीभ फीके रंग का हो जाती है।

बहुमूत्रा रोगः- रोगी को जब बार-बार तथा बूंूद-बूंद करके कम मात्रा में पेशाब आने लगता है या अधिक मात्रा में अधिक बार पेशाब आने लगे या प्रमेह रोग की शिकायत होती है तो उसकी जीभ अत्यधिक चमकदार हो जाती है।

शरीर में शोथ होनाः- शरीर के किसी भी भाग में सूजन या सड़न क्रिया के होते रहने से उस व्यक्ति की जीभ सूझकर मोटी हो जाती है तथा जीभ पर कालिमा युक्त छोटे-छोटे दाने हो जाते हैं।

यकृत विकृति मेंः- यकृत विकृति, कामला रोग या चेचक जैसे प्राणघातक रोगों में जीभ के ऊपरी भाग पर एक प्रकार की काली तह (परत) जम जाया करती है। मोतीझरा के होने पर जीभ भूरी हो जाती है।

पक्षाघात रोगः- जब रोगी पक्षाघात (लकवा) का शिकार हो जाता है तो उसकी जीभ मुख के बीच में न रहकर एक तरफ खिसककर सिमट जाती है।

शरीर में पानी की कमीः- शरीर का जलीय अंश जब किसी कारण से कम होने लगता है तो उस व्यक्ति की जीभ एवं गला सूखने लग जाता है। वात एवं पित्त की विकृतियों में भी रोगी के जीभ की यही स्थिति होती है।

फुफ्फुस का कार्य न करनाः- जब शरीर में स्थित फुफ्फुस अपने कार्य को ठीक ढंग से नहीं कर पाते या रोगी विशूचिका से ग्रस्त हो जाता है या फिर उसके आन्तरिक अंगों की सड़न की स्थिति गंभीर हो जाती है तो उसकी जीभ शीशे की तरह सफेद होकर छालों से ग्रसित हो जाती है।

हिस्टीरिया मेंः- जब रूग्णा हिस्टीरिया या रोगी मिर्गी की बीमारी से ग्रसित रहता है तो उसकी जीभ पर काटने के चिन्ह मौजूद रहते हैं।

आक्सीजन की कमी मेंः- हृदय रोगों के कारण या अन्य कारणों से जब रोगी के शरीर में आक्सीजन की कमी हो जाती है तो रोगी की जीभ नीले रंग की हो जाती है।

टांसिल्स के बढ़ने परः- जब रोगी के टांसिल बढ़ जाते हैं तथा गले में सूजन आ जाती है तो उसकी जीभ गहरे लाल रंग की हो जाती है।

तेज बुखार होने परः- जब रोगी के शरीर में बुखार का तापमान अधिक रहता है तो उसकी जीभ खुश्क होकर सूखने लगती है तथा वह मटमैली हो जाती है।

नये रोगों के आगमन परः- जब किसी नये रोग का आगमन होने लगता है तो उससे पूर्व व्यक्ति की जीभ असामान्य रूप से कांपने लग जाती है।

अन्य लक्षणः- रक्त एवं वात की विकृति की स्थिति में जीभ अकड़ जाती है तथा बोलने में कष्ट होता है। मानसिक एवं वात रोग की स्थिति में जीभ मुख से बाहर निकलने की स्थिति में नहीं रहती है। प्लीहा एवं तिल्ली के बढ़ने की स्थिति में जीभ फीकी एवं सफेद रंग की हो जाती है। जब जीभ स्वयं सूज जाती है तो उस पर गहरा लाल रंग एवं अकुलाहट-सी होने लगती है।

मस्तिष्क की विकृति में रोगी जीभ को सक्रिय करने में असमर्थ हो जाता है। आंतों में विकृति आ जाने या यकृत क्रिया के कमजोर हो जाने पर जीभ पर सफेद तह जम जाती है। आमाशय शोथ की बीमारी में। जीभ पर धब्बे दिखाई देते हैं। रक्तज्वर में जीभ पर कांटे से, दांत के रोगों में जीभ का पिछला भाग मैला, उपदंश या सूजाक में जीभ पर सड़े घाव का होना दिखता है।

इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। अधिक जानकारी के लिए कृपया अपने इलाज करने वाले चिकित्सक से परामर्श लें।

R. Singh

Name: Rajesh Kumar Gender: Male Years Of Experience: 15 Years Field Of Expertise: Politics, Culture, Rural Issues, Current Affairs, Health, ETC Qualification: Diploma In Journalism

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