Religion : संक्षिप्त में जानें धर्म का वास्तविक स्वरूप
Religion: Know the real nature of religion in brief

Religion : धर्म वास्तव में स्वभाव को कहते हैं। हर व्यक्ति का अपना स्वभाव होता है। वस्तुओं का भी अपना-अपना स्वभाव होता है। हम कहते हैं कि पानी का यह धर्म है तथा अग्नि का धर्म पानी के धर्म के विपरीत होता है। धातुओं का यह धर्म है।
जब स्वभाव ही धर्म है तो हर व्यक्ति का अपना अलग धर्म हुआ। संत का स्वभाव हुआ परोपकार तथा दुष्ट का परपीड़न या कह सकते हैं कि परोपकारी संत होता है और परपीड़क दुष्ट।
हिंदू धर्म अच्छा है या ईसाई धर्म अच्छा है या सत्य अच्छा है या असत्य अच्छा है, ये सब समय-सापेक्ष तथा स्थान-सापेक्ष स्थितियाँ हैं। मनु ने धर्म के दस लक्षण बताएं हैं:-
धृतिः क्षमा दमो स्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्।।
जिस व्यक्ति के स्वभाव में इन दस लक्षणों का समावेश होगा, वह व्यक्ति धर्म से युक्त होना ही चाहिये, चाहे वह हिंदू हो अथवा अन्य कोई। यदि संकुचित दृष्टि से ऊपर उठ कर देखें तो पाते हैं कि उपरोक्त दस लक्षण ही नहीं अपितु जितने भी सकारात्मक गुण हैं उनका समुच्चय ही धर्म है।
यदि हम धर्म को कुछ विशेष लक्षणों या गुणों तक सीमित कर देते हैं तो यह हमारी संकीर्णता है। संकीर्ण मनोवृत्ति का त्याग भी महान धर्म है। जैन धर्म जब अनेकांतवाद को स्वीकार करता है तभी वह सच्चे अर्थों में महान धर्म है। महावीर स्वामी की पूजा महान जैन धर्म नहीं है। महावीर स्वामी के गुणों को आत्मसात करना महान धर्म है।
यदि हम कहते हैं कि गर्व से कहो हम भारतीय हैं तो हम राष्ट्रवादी संकीर्णता में जकड़े हैं। जातीय गौरव की बात करके हम जातीयता की संकीर्ण श्रृंखलाओं में बँध जाते हैं। धर्म तो वह तत्व है जो उन सभी गुणों को धारण करता है जिनसे मनुष्य विकार रहित होकर अपना स्वाभाविक विकास करता है और इस विकास से किसी दूसरे के विकास में बाधा उत्पन्न नहीं होती चाहे वह मनुष्य हो अथवा मनुष्येतर प्राणी या प्रकृति।
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सह अस्तित्व के विकास का सिद्धांत ही धर्म है। कोई भी स्थिति या विचार जो हमारे जीवन को सकारात्मक सहारा प्रदान करे धर्म है। धर्म एक कला है जिसके सहारे जीवन को अच्छा बनाया जाता है।



