Natural cure for paralysis : लकवा रोग की प्राकृतिक चिकित्सा

Natural cure for paralysis : लकवा रोग की प्राकृतिक चिकित्सा

पक्षाघात, फालिज तथा अंग्रेजी में पैरेलिसिस (Paralysis) के नाम से जाना जाने वाला रोग ‘लकवा’ वास्तव में कोई रोग नहीं है बल्कि मस्तिष्क, रीढ़ या किसी स्नायु-विशेष के रोग से ही उसके अधीनस्थ अंग में जड़ता आने को लकवा कहकर पुकारा जाता है।

यह सभी जानते हैं कि मस्तिष्क शरीर के संचालन का केन्द्र है। मस्तिष्क और शरीर का संबंध अत्यंत सूक्ष्म नाड़ियों द्वारा बना रहता है जिसे स्नायु संस्थान (नर्वस-सिस्टम) कहते हैं। आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य शरीर में 72,000 नाड़ियां हैं। ये नाड़ियां चेतना-तंतु के रूप में मस्तिष्क द्वारा भेजे गये संदेशों को सारे शरीर में त्वरित गति से पहुंचाती हैं।

सूचना के आदान प्रदान और संतुलन से शरीर अपना कार्य ठीक तरह से संपादित करता है। यदि किसी कारणवश बीमारी, चोट या सदमे के कारण मस्तिष्क अपने आदेश शरीर के अंगों को नहीं भेज पाता है तो इस अवस्था में शरीर के अंग अपना हलचल नहीं कर पाते और वे बेकार हो जाते हैं। इसी अवस्था को लकवा या फाॅलिज कहते हैं।

लकवा होने का कारण (Cause of Paralysis)

लकवा होने का पहला कारण है – मस्तिष्क की धमनियों द्वारा रक्त के रूप में मिलने वाले पोषण का रूक जाना। मस्तिष्क के जिस भाग को रक्त नहीं मिल पाता, वह भाग बेकार हो जाता है और फलस्वरूप शरीर के कुछ हिस्सों को आदेश नहीं पहुंच पाता।

रक्त प्रवाह रूकने के दो कारण हैं, पहला, धमनी के भीतर रक्त के थक्के जम जाना। मधुमेह रोगी, अत्यधिक वसा खाने वाले लोगों और बूढ़े व्यक्तियों में थक्के बनने की संभावना अधिक रहती है। यह थक्का शरीर के किसी भी भाग में बना हो, वह धमनी के सहारे मस्तिष्क में पहुंचकर अवरोध पैदा कर सकता है।

लकवा लगने का दूसरा कारण है – धमनी का फटना। जो हाई ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप) के रोगी हैं और जो छोटी-छोटी बात पर बहुत नाराज़ हो जाते हैं, क्रोध और तनाव उनके रक्त में थक्का बना डालता है। इससे खतरनाक घटना घटती है जिसे धमनी का फटना या ‘सेरेब्रल हेमरेज’ कहते हैं। इससे आदमी के बचने की कम ही उम्मीद रहती है। इस घटना से आदमी तुरंत बेहोश हो जाता है। इस बीच अचानक लकवा हो जाता है जिसे वह अगर होश में आ जाय तो महसूस कर पाता है कि शरीर के कुछ अंगों को वह हिला-डुला पाने में असमर्थ है।

इसके अन्य प्रमुख कारणों में निम्न हैं जिनसे लकवा कभी न कभी हो जाता है – मिरगी, हिस्टीरिया, अत्यधिक शोक और अत्यधिक खुशी से, अधिक सहवास तथा अधिक मानसिक श्रम जैसे चिंता से भी लकवा हो सकता है। धातुक्षीणता, रक्त की कमी, सिर में चोट लगना, लगातार सिरदर्द होना, विषपान से, अत्यधिक व्यायाम, मल मूत्रा के वेग को रोकने से, उच्च रक्तचाप, तेज सवारी में अधिक दौड़ से, मस्तिष्क व रीढ़ की बीमारी से, गठिया, डिप्थीरिया, हड्डी टूटने से, एस्प्रीन सेरीडोन, मर्फिया, ब्रोमाइड, एण्टीबायोटिक्स आदि तीव्र औषधियों के ज्यादा सेवन से, रात को अधिक जागने से, अत्यधिक सर्दी से, अधिक शराब पीने से, अत्यधिक लिखने-पढ़ने और तनाव के कारण और पुराने हृदय रोग के कारण लकवा हो सकता है।

आयुर्वेद के अनुसार शरीर में गमन करने वाली उदानवायु और व्यान वायु के कुपित होेने से लकवा हो जाता है।

लकवा (Paralysis) होने के पूर्व के लक्षण

लकवा होने से पहले ये लक्षण महसूस होते हैं -(Natural cure for paralysis)

  • जिस अंग पर लकवा होने को होता है, उस अंग के स्नायु शिथिल पड़ जाते हैं।
  • मन में उत्साह नहीं रहता।
  • रक्तचाप बढ़ जाता है।
  • स्वभाव बहुत जिद्दी हो जाता है।
  • भूख, नींद और कामेच्छा कम हो जाती है।
  • जिस ओर लकवा मारने वाला होता है, उस ओर की नाक में खुजलाहट होती है।
  • किसी भी काम को करने में परेशानी होती है।
  • शरीर का वह भाग सुन्न पड़ने लगता है।
  • लगातार कब्ज रहने लगता है।

इन लक्षणों को देखकर शीघ्र इलाज शुरू कर के लकवा से बचाव किया जा सकता है।

लकवा के प्रकार (Types of Paralysis)

मोटे तौर पर लकवा 20 प्रकार का होता है लेकिन हम मात्रा पांच प्रकार के लकवा पर चर्चा करेंगे।
अर्धाग का लकवा – इसे पक्षाघात कहते हैं। इसका प्रभाव एक तरफ के हाथ, पैर, मुख और जीभ पर होता है।
एकांग का लकवा – लकवा लगने से जब एक अंग निष्क्रिय अथवा बेकार हो जाता है तब उसे एकांग का लकवा कहा जाता है।

पूर्णांंग का लकवा – जब दोनों हाथ व दोनों पांव जड़ हो जायें तो इसे पूर्णाग का लकवा कहेंगे।
निम्नांग का लकवा – शरीर के निचले आधे भाग अर्थात् कमर से पैर की उंगलियों तक लकवा मार जाने पर उसे निम्नांग का लकवा कहा जाता है।
सकम्प लकवा – वृद्धावस्था के कारण अथवा अत्यधिक कमजोरी के कारण मस्तिष्क अपना कार्य ठीक तरह नहीं कर पाता, उस स्थिति में सारा शरीर असंतुलित हो जाता है और जुबान से लेकर उंगलियां तक कांपने लगती हैं, ऐसी दशा को सकम्प लकवा कहते हैं।

लकवा से बचाव (Natural cure for paralysis)

लकवा से बचाव के लिए सर्वप्रथम उन कारणों को दूर करना चाहिए जिससे लकवा की संभावना होती है। जब ऐसा महसूस होने लगे कि लकवा होने वाला है तब सभी परिश्रम वाले काम बंद कर देने चाहिए और पूर्ण शारीरिक व मानसिक विश्राम करना चाहिए। संभव हो तो एक दो दिन के अंदर किसी पर्यटन स्थल पर चले जाएं।

  • सुबह शाम टहलना, प्राकृतिक भोजन, व्यायाम-मालिश, मनोरंजन, प्राणायाम, ध्यान तथा ईश्वर की प्रार्थना जैसे सद्कर्मों में संलग्न हो जायें। शवासन अत्यंत लाभकारी है।
  • सिर में नारियल या तिल का तेल लगाकर मालिश करें।
  • औषधि के रूप में ब्राह्मी, कागजी बादाम और मिश्री का चूर्ण 5-5 ग्राम सुबह शाम गाय के गर्म दूध के साथ सेवन करना चाहिए।
  • अन्य उपायों में, उपवास के द्वारा शरीर के मल को निष्कासित करें।
  • शरीर की स्वच्छता पर विशेष ध्यान दें। स्नान करते समय रीढ़ की हड्डी में नल का पानी तीव्र गति से गिरने दें।
  • प्रसन्नता और उत्साह लकवा को दूर रखता है।
  • पानी पर्याप्त पीना चाहिए ताकि पेट की सफाई यथा समय होती रहे।
  • लहसुन के तेल से रोगी की मालिश करनी चाहिए। मालिश धीरे-धीरे एवं पर्याप्त समय तक करनी चाहिए।
  • रोग कब और किन परिस्थितियों में हुआ था इसका इतिहास भी स्मरण में रखना चाहिए। साथ ही रोगी की प्रकृति व
  • उम्र का भी ख्याल रखना चाहिए, तभी चिकित्सा ठीक तरह से दी जा सकती है।
  • नदजीक के किसी भले वैद्य या औषधि विक्रेता से सलाह अवश्य लेनी चाहिए।

लाभकारी फल व शाक (Natural Cure for Paralysis)

लकवा के निदान के लिए सेब, अंगूर और नाशपाती का नियमित रूप से सेवन करना चाहिए। इसके अलावा विटामिन ‘बी’ वाले खाद्य पदार्थ जैसे दूध, दही, मक्खन, छाछ, लहसुन, परवल, पेठा, बैंगन, केले का फूल, करेला, जमीकंद, अदरक, पका आम, पका पपीता, कच्चा नारियल, सूखा मेवा, मधु, मेथी का साग, बथुवा, प्याज, तुरई, लौकी, टिंडा, शलजम, अंजीर, गरम पानी, पुराना चावल, खजूर, मूंग की दाल आदि लाभदायक होते हैं।

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ये पदार्थ न खायें (Natural Cure for Paralysis)

  • नमक न खायें।
  • प्रारंभ में तरल पदार्थ लें।
  • मसालेदार भोजन न करें।
  • नशापान न करें।
  • नया चावल, बुम्हड़ा, गुड़, भैंस का दूध, उड़द, भिंडी, घुइयां, तरबूज तथा बर्फ का सेवन न करें।
    अन्य उपाय
  • प्रतिदिन लाल कपड़ा ओढ़कर दो घंटा धूप मंे लेटें। सिर न ढकें।
  • पैरों को गर्म पानी में डुबायें एवं सिर में गीला कपड़ा लपेट कर 15 मिनट रहें।
  • सप्ताह में दो दिन नमकीन जल से नहायें।
  • पीले रंग के बोतल में साफ पानी भर कर सूर्य के ताप में तपने दें, फिर एक-एक घूंट पानी पियें।

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लहसुन की चटनी

लहसुन की कुछ कलियां अच्छी तरह पीस लें। उसमें एक चम्मच शहद मिला आधा कप दूध मिला कर पियें। यह दवा तीन बार लें। इसका प्रयोग 6 माह तक करना चाहिए।
उपरोक्त प्रकार से ‘लकवा’ पूरी तरह दूर हो जाता है।

R. Singh

Name: Rajesh Kumar Gender: Male Years Of Experience: 15 Years Field Of Expertise: Politics, Culture, Rural Issues, Current Affairs, Health, ETC Qualification: Diploma In Journalism

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