Best Kids Story in Hindi : एक और एक ग्यारह
Best Kids Story in Hindi: One and One Eleven

Best Kids Story in Hindi : बेटे से उसके पिता ने पूछा – बेटा एक और एक कितने होते हैं। बेटे का उत्तर था – पिताजी दो। पिता ने कहा नहीं बेटा-एक और एक ग्यारह होते हैं। बेटा पिता का चेहरा देख रहा था। पिता ने समझाना शुरू किया। एक ओर एक ग्यारह कहावत का अर्थ है – संगठन।
तुमने रस्सा कस्सी का खेल देखा होगा। दो दल मोटे रस्से को अपनी अपनी ओर खींचते हैं। यदि एक हाथ से वह रस्सा खींचा जाय तो उसमें खींचने की ताकत नहीं आती है पर दूसरा हाथ लगते ही हाथों में ग्यारह गुना बल आ जाता है। आदमी एक पैर से दौड़े और दो पैर से दौड़े, उसमें ग्यारह गुना बल अधिक हो जाता है।
हाथ की अंगुलियां
उसके पिता ने उसे हाथ की अंगुलियां दिखाते हुये बताया-देखो चारों अंगुलियां बराबर नहीं है। सभी छोटी बड़ी हैं। उन्होंने अंगुलियों को हथेली पर मोड़ कर दिखाया और कहा। देखो चारों अंगुलियां झुककर हथेली में बराबर हो गई हैं। इसी का नाम संगठन है। संगठन में छोटे-बड़े, ऊँच-नीच का ध्यान नहीं रखना चाहिये।
उन्होंने अब अंगूठे से अंगुलियों को दबाकर कहा-अब अंगूठे का दबाव से यह मुट्ठी बन गई है। इन अंगुलियों में जो ताकत थी, वह अब संगठित होकर कई गुना बढ़ गई है। किसी को तमाचा मारो एवं मुट्ठी से आघात करो तो संगठन का बल साफ नजर आयेगा।
उन्होंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा-संगठन सिर्फ इकट्ठा होने का नाम नहीं है बल्कि यह प्रक्रिया तभी संगठन कहलाती है जब उससे किसी उद्देश्य की प्राप्ति होती है।
संगठन का महत्त्व
पिता ने बेटे को बताया-भगवान ने हमें दो हाथ, दो पैर, दो आंखें, दो कान इसीलिए दिए हैं ताकि हमें संगठन का महत्त्व समझ में आये। जब तक मिलकर अनुशासन से काम किया जाये, तब तक सभी अंग ठीक से काम करेंगे। अनुशासनहीनता होने पर या शरीर के सारे अंग अगर मनमाने ढंग से अपना अपना कार्य करने लगें जैसे कोई हाथ खाना उठा रहा है, कोई हाथ हवा में झुल रहा है, आंखें रो रही हैं, सिर हवा में लहरा रहा है, तो इन सारी हरकतों को एक ही नाम दिया जा सकता है ‘पागलपन’ का परंतु विभिन्न विचार और प्रकृति वाली चीजें भी अगर एक जुट हो एक उद्देश्यपूर्ण कार्य करें तो संगठन सर्व जन सुखाय और देव स्वरूप हो जाता है।
उन्होंने दीपक की ओर इशारा करते हुए बताया-दीपक को ही लो, रूई और घी दोनों ही ज्वलनशील होने पर भी एक ही पात्रा में रहते हुए औरों को प्रकाश देते हैं।
व्यक्तिगत भाव
संगठन सदैव व्यक्तिगत भाव से ऊपर उठकर समष्टिगत होता है। फूल को उठाकर एक व्यक्ति उसकी सुगंध ले व्यक्तिगत आनन्द उठाता है परंतु फूलों को पिरोकर माला बनाने वाला उसे स्वयं धारण नहीं करता बल्कि किसी और को पहनाता है। इस प्रकार संगठन त्याग की प्रखर भावना को जन्म देता है।
बेटे को संगठन का महत्त्व समझाते हुए उन्होंने कहा कि किसी कवि ने ठीक ही लिखा है –
पत्थर एक दूसरे पर बैठकर
तुंग शिखर बन गये।
बिन्दु एक दूसरे पर फैलकर
रत्नाकर बन गये।
क्षण एक दूसरे में समाकर
मन्वन्तर बन गये।
शब्द एक दूसरे से जुड़कर
अमर ग्रंथ बन गये।
हर एक बड़प्पन अनेक समर्पणों का ही कृतित्व है।
बेटे को संगठन के बारे में इतनी सारी बातें जानकर हर्ष हो रहा था। बेटे ने भी एक घटना का उदाहरण दिया। उसने कहा-पिताजी जब मैं स्कूल से आ रहा था। मैंने देखा श्रमिकांे की भीड़ लगी हुई थी। एक नेता मंच पर आया। उसने श्रमिकों को एक कच्चा सूता दोनों हाथों के अंगुलियों में पकड़कर दिखाते हुए कहा देखो, इस कच्चे धागे को मैं फूंक मार कर तोड़ सकता हूं। उसने फूंक मारी, सूत टूट गया। फिर उसने अपनी जेब से धागों से बनी रस्सी निकाली और कहा- इसे खींचने पर भी यह नहीं टूटेगी। उसने बताया संगठन ही शक्ति है और विघटन ही विनाश।
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अभिमान नहीं करना चाहिये
संगठन में नेतृत्व करने वाले को कभी अभिमान नहीं करना चाहिये। इस बारे में उन्होंने उसे एक कथा सुनाई-अंगिरा ऋषि के शिष्य उदयन बड़े प्रतिभाशाली थे। उन्हें अपनी प्रतिभा का बखान करने में बड़ा आनन्द आता था। ऋषि की समझ में यह बात आ गई। सर्दी के दिन थे। सभी शिष्य आग ताप रहे थे। कोयले की आग थी। एक कोयला अधिक धधक रहा था। उदयन को सबक देने के उद्देश्य से ऋषि ने कहा देखो-यह कोयला सबसे अधिक धधक रहा है। इसका ताप लेने के लिए इसे मेरे पास निकालकर रख दो।
कोयले को निकाल कर रख दिया गया। सबने देखा थोड़ी ही देर में कोयले को राख ने ढक दिया और उसकी चमक दमक समाप्त हो गई। सभी शिष्य और उदयन को संगठन के चमत्कार की शक्ति समझ में आ गई। गुरूजी ने कहा-संगठन परंपरा यह अंगीठी है। प्रतिभायें संगठित रूप में ही सार्थक हैं।
जीवन को गरिमा
जीवन को गरिमा प्रदान कर उस उद्देश्य को सुन्दर और उदाहरणीय बना देता है संगठन। द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजों ने भारत को जबरदस्ती युद्ध की आग में झोंक दिया था। हजारों भारतीय जर्मनी और जापान में बंदी बनाये गये। सुभाष चन्द्र बोस ने इन्हीं बंदियों को संगठित कर आजाद हिन्द फौज बनायी। कल तक जो बंदी थे, आज वही देशभक्त सिपाही थे। संगठन के अर्थपूर्ण उद्देश्य ने गुलामों को भी स्वाभिमान और उत्सर्ग की गरिमा प्रदान की।
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संगठन अस्तित्व को जन्म देता है। गौरव को जन्म देता है। झाडू बंटकर से तिनका रह जाएगा, सागर हिस्सों में बंटकर सिर्फ जलाशय और हिमालय बिखर कर पहाड़ी अर्थात् संगठन के बिना माला, झाडू, सागर, हिमालय जैसे गौरवमयी नाम ही मिट जायेंगे।
संगठन उत्तरोत्तर विशाल होता हुआ मर्यादित और पूज्य होता जाता है। व्यक्ति से बड़ा कुल होता है, कुल से बड़ा समाज, समाज से बड़ा राष्ट्र, राष्ट्र से बड़ा विश्व। पृथ्वी अपनी पूर्ण संपदा के साथ विश्व से बड़ी होती है। पृथ्वी जैसे असंख्य नक्षत्रों से बड़ी आकाश गंगा और असंख्य आकाश गंगाओं से अधिक प्रणम्य है ब्रह्माण्ड।
दुर्गापूजा का पर्व
उसके पिता जी उसे कुछ दिन पहले ही दुर्गापूजा दिखाकर आये थे। उन्होंने कहा- दुर्गापूजा का पर्व संगठन शक्ति का प्रतीक है। महाबली महिषासुर का वध करने के लिए ब्रह्माजी ने दुर्गा नामक शक्ति को प्रकट किया। सभी देवी-देवताओं ने अपने अपने हथियार प्रदान किये। यह शक्ति बनी दुर्गा पर तुमने देखा होगा शक्ति के साथ गणेश रूपी विवेक, लक्ष्मी रूपी धन, सरस्वती रूपी ज्ञान और कार्तिकेय रूपी नेतृत्व का होना आवश्यक है। किसी भी ध्येय की सफलता के लिए इन पांचों का साथ होना जरूरी है।
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