Sports : Excellent स्वास्थ्य के लिए जरूरी है खेल, जानें कैसे
Sports are important for good health

Sports : ’शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्‘ संस्कृत की इस प्रसिद्ध उक्ति का अर्थ है। शरीर की रक्षा और उसे निरोग रखना मनुष्य का सर्वप्रथम कर्तव्य है। उसके लिये यह आवश्यक है कि मनुष्य नियमित रूप से कोई ऐसा कार्य करे जिससे अंग-प्रत्यंग को शक्ति मिले, मांसपेशियां और स्नायु मजबूत हों एवं शरीर में स्वस्थ रक्त का संचार हो।
जिस प्रक्रिया से हम अपने अंग-प्रत्यंग को शक्ति दे सकते हैं उसे हम व्यायाम के नाम से जानते हैं। दंड बैठक करना, मुगदर भांजना, कुश्ती लड़ना, तैरना, घुड़सवारी करना, फुटबाल कबड्डी आदि खेलना और टहलना, ये सब व्यायाम के ही विभिन्न रूप हैं। इन सारे व्यायामों को करने के लिये मैदान की आवश्यकता पड़ती है परन्तु हमारे देश में इनका अभाव है।
एक कहावत है ’जितने ज्यादा खेल के मैदान, उतने कम अस्पताल।‘ इस कहावत में खेल के मैदान एवं अस्पताल में जो संबंध दर्शाया गया है, वह संबंध सरल एवं स्वाभाविक है। जरा गहराई से सोचा जाये तो यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि खेल के मैदानों की संख्या एवं अस्पतालों की संख्या में सीधा संबंध है। जिस देश में खेल के मैदानों की संख्या अधिक है वहां के नागरिकों का स्वास्थ्य बेहतर है और यदि स्वास्थ्य बेहतर है तो वे अस्पतालों से दूर हैं।

स्वास्थ्य को बेहतर बनाये रखने के लिये संतुलित आहार, स्वच्छ वातावरण एवं व्यायाम अत्यन्त आवश्यक (exercise is very important) हैं परन्तु आज के युग में शहरों एवं महानगरों में खेल के मैदान की बात तो अलग है, खुले मैदानों का होना भी दुर्लभ होता जा रहा है। शहरों में जनसंख्या का जमाव इतना घना हो गया है कि वातावरण दिन-प्रतिदिन विषाक्त ही होता जा रहा है। इस वातावरण का सीधा प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है। स्वास्थ्य को बेहतर बनाये रखने और वातावरण को स्वच्छ रखने हेतु मैदानों के महत्व को नकारा नहीं जा सकता।
खेल तो मानव की जन्मजात प्रक्रिया है। वैसे व्यायाम के तो अनेक तरीके हैं परन्तु खेलों द्वारा व्यायाम को सर्वश्रेष्ठ तरीका माना जाता है क्योंकि इससे कसरत के अलावा खेल भावना, समूह भावना, अनुशासन, कर्तव्य परायणता जैसे गुणों का बहुमुखी विकास भी होता है।
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मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से खेल का महत्व (Importance of Sports)
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी खेल का उतना ही महत्व है जितना कि प्राकृतिक दृष्टिकोण से क्योंकि खेल के द्वारा ही अनेक प्राकृतिक इच्छाएं जैसे दौड़ना, कूदना, फैंकना, विरोधी को पराजित करना आदि पूरी की जा सकती हैं। खेल से खेेलने वालों का जहां मनोरंजन होता है वहां उसे देखने वाले का भी मनोरंजन होता है। खेल का आनंद तो सभी उठाते हैं, इसीलिये स्टेडियमों एवं टेलीविजन प्रसारणों की व्यावस्था की जाती है।
खेलों द्वारा चरित्र निर्माण (Play Sports)
खेलों द्वारा आपस में सहयोग, सद्भावना, देश-प्रेम, चरित्र निर्माण जैसे गुणों का विकास होता है। आज की पीढ़ी जो कल का भविष्य होगी, उनमें इन गुणों का समावेश कराकर एक मिसाल कायम की जा सकती है। यदि हम इतिहास के कुछ पन्नों को पलटें तो स्पष्ट होगा कि वाटरलू के मैदान में नैपोलियन को हराने वाले सेनापति वेल्सन और वेलिंगडन जैसे वीर पुरूषों का विकास ब्रिटेन के हेरो तथा ईडन के मैदानों में हुआ था।

खेलों की उपेक्षा (Play Sports)
हमारे जीवन में खेलों का इतना अधिक महत्त्व होने के बावजूद हमारी शिक्षा प्रणाली में आज तक खेलों के प्रति उपेक्षा ही देखने को मिलती है। देश के 40 प्रतिशत शिक्षण संस्थानों में खेल के मैदानों का अभाव है। 60 प्रतिशत में अगर खेल के मैदान हैं भी तो उसकी उचित देखभाल नहीं की जाती। खेल सुविधाओं का सीधा असर विद्यार्थियों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसके लिये जरूरी है कि उपेक्षा छोड़ विकास के अवसर उपलब्ध कराये जाने चाहिए।
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पहला सुख निरोगी काया (Play Sports)
इस बात से तो इंकार नहीं किया जा सकता कि स्वस्थ शरीर के निर्माण में खेलों का काफी योगदान होता है। स्वस्थ शरीर के महत्त्व को सदियों पूर्व हमारे पूर्वजों ने भी समझा था। हजारों वर्ष पूर्व यूनानी भी ’स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क‘ होता है‘, में विश्वास रखते थे। इसी को आधार मानकर उन्होंने अपनी शिक्षा प्रणाली का निर्माण किया। इस महत्त्व को हमें भी समझ कर इस दिशा में कुछ करना होगा। यदि शरीर स्वस्थ होगा तो प्रत्येक क्षेत्रा में प्रगति होगी।
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खेलों के विकास में योगदान (Development of Sports)
खेल के ये मैदान नागरिकों के बेहतर स्वास्थ्य की कामना तो करते ही हैं, साथ ही खेलों के विकास में अपना काफी महत्वपूर्ण योगदान निभाते हैं। आज के युग में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो भी देश खेलों में अपना वर्चस्व बनाये हुए हैं उस देश में पर्याप्त खेलों के मैदान हैं। साथ-साथ वहां खेलों की अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। कोरिया जैसा छोटा देश आज अगर रूस और अमेरिका का मुकाबला कर रहा है तो उसके मूल में यही कारण है।

यदि खेल के मैदान अधिक मात्रा में हों तो जनसाधारण के लिये उनका उपयोग करना आसान हो जाता है। कबड्डी, दौड़, खो-खो, फुटबाल आदि भारतीय खेल व्यायाम की दृष्टि में भी पूर्ण हैं जिनके लिये मैदानों का होना अनिवार्य है।
जितना पैसा दवाइयों आदि पर खर्च किया जा रहा है अगर उसका दो प्रतिशत भी खेल के मैदानों पर खर्च किया जाये तो हम भावी पीढ़ी को काफी हद तक अस्पतालों और दवाइयों से दूर रखने में कामयाब हो सकते हैं। खेल मैदान स्वास्थ्य सुधार में महत्त्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।



