Jambukeshwar Temple : भगवान शिव का जलतत्व लिंग

Jambukeshwar Temple: Jaltattvalinga of Lord Shiva

Jambukeshwar Temple: Jaltattvalinga of Lord Shiva
Jambukeshwar Temple: Jaltattvalinga of Lord Shiva

Jambukeshwar Temple : दक्षिण भारत के जंबूकेश्वर को पंचतत्व लिंगों में से एक जलतत्व लिंग के रूप में जाना जाता है। अत्यंत प्राचीन जंबूकेश्वर मंदिर में महादेव साक्षात लिंग विग्रह के स्वरूप में यहां स्थित हुए माने जाते हैं।

पूर्व काल में कभी जामुन के वृक्षों के घने जंगल में एक ऋषि निवास करते थे। जंबू (जामुन) वन में रहने के कारण लोग उन्हें जंबू ऋषि के नाम से जानने लगे। ऋषि शिव की उपासना में लीन रहते। उसकी अटूट श्रद्धा से प्रसन्न होकर एक दिन भगवान शिव स्वयं प्रकट हो गए और ऋषि द्वारा यहीं रुकने की प्रार्थना पर वे विग्रह के रूप में यहां पर स्थित हो गए।

एक अन्य कथा के अनुसार एक मकड़ी ने शिव लिंग पर एक जाल बुन दिया क्योंकि जामुन के पत्ते शिवलिंग पर गिरते रहते थे। दूसरी ओर एक हाथी अपनी सूंड़ में जल भर कर लाता और शिवलिंग का अभिषेक करता। हाथी को यह जाला शायद अच्छा नहीं लगता होगा, इसलिए वह उसे सूंड़ से तोड़ देता।

मकड़ी को भी यह अच्छा नहीं लगता था कि हाथी उसके बुने जाल को तोड़ दे। एक दिन हाथी ने मकड़ी को मारने के लिए सूंड़ बढ़ाई तो मकड़ी उसकी सूंड़ के भीतर घुस गई। फलस्वरूप हाथी और मकड़ी दोनों मर गए। दोनों के भाव शुद्ध थे, अत: भगवान शिव ने दोनों को निज जन के रूप में मान्यता दे दी। यह कथा मंदिर में लगे एक शिलालेख पर अंकित है।

जंबूकेश्वर मंदिर (Jambukeshwar Temple)

सौ बीघा क्षेत्र में फैले जंबूकेश्वर मंदिर के तीन आंगन हैं। मंदिर प्रवेश करने पर जिस आंगन में यात्री पहुंचते हैं, वह आंगन देखते ही यात्रियों का विस्मय से जड़ हो जाना स्वभाविक है क्योंकि यहां 400 स्तम्भ बने हैं, जो उत्कृष्ट एवं बेजोड़ कला का नमूना हैं।

आंगन में दाहिनी ओर एक सरोवर है जिसके मध्य में मंडप बना है। निकट ही स्थित श्री रंग मंदिर से श्री रंग की उत्सव मूर्ति को वार्षिक उत्सव पर यहां लाया जाता है। श्री जंबूकेश्वर मंदिर पांचवें घेरे में है। इस जगह श्री जंबूकेश्वर लिंग एक जल प्रवाह के ऊपर स्थापित है तथा लिंगमूर्ति के नीचे से लगातार जल ऊपर आता रहता है। जल के ऊपर मूर्ति के ऊपरी भाग के ही दर्शन होते हैं।

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जंबूकेश्वर मंदिर की पिछली ओर एक चबूतरा बना है, जिस पर जंबू का एक प्राचीन वृक्ष है। यह वही वृक्ष है जिसके कारण मंदिर तथा शिवलिंग का नाम जंबूकेश्वर पड़ा। कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने यहां पर श्री जंबूकेश्वर लिंग मूर्ति की पूजा अर्चना की थी। यहां शंकराचार्य की मूर्ति भी है।

जंबूकेश्वर मंदिर की तीसरी परिक्रमा में सुब्रह्मण्यम् का मंदिर है। इस मंदिर में अनेक भव्य एवं कलात्मक मंदिर हैं। मंदिर की परिक्रमा में श्री राजराजेश्वर मंदिर है, जिसमें भगवान शिव का पंचमुखी लिंग स्थापित है।

Akhilandeshwari Temple
Akhilandeshwari Temple

अखिलांडेश्वरी मंदिर

इसके प्रांगण में भगवती जगदम्बा का एक विशाल मंदिर है। यहां पर अम्बे भवानी को अखिलांडेश्वरी कहते हैं। यहां निज मंदिर के पास गणेश जी का मंदिर है, जिसमें आदिशंकराचार्य द्वारा स्थापित गणेश मूर्ति मां जगदम्बा की मूर्ति के ठीक सामने दिखाई देती है। मां अंबा के निज मंदिर में मां भगवती की मूर्ति अत्यंत भव्य है। अंबे भवानी की यह मूर्ति तेजोद्दीप्त है।

ऐसा बताते हैं कि पूर्व समय में यह मूर्ति इतनी उग्र थी कि मूर्ति के दर्शन करने वाले के प्राण निकल जाते थे। आदिशंकराचार्य जब इस जगह पधारे तो उन्होंने उग्रता शांत करने के लिए मां अम्बे के दोनों कानों में हीरक जडि़त श्री यंत्र के कुंडल पहना दिए और उनके सम्मुख प्रांगण में गणेश जी की मूर्ति स्थापित करवा दी। सामने पुत्र की मूर्ति होने से मां जगदम्बे का तेज वात्सल्य के कारण धीरे-धीरे सौम्य हो गया।

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यहां के आसपास के क्षेत्र में स्थित मंदिरों में श्री निवास भगवान का श्री निवास मंदिर, महामाया (मारी अम्मानï्) का समयपुरम् में स्थित भव्य एवं विशाल मंदिर, ओरैय्यूर में श्री लक्ष्मी जी का भव्य मंदिर आदि ऐसे स्थान हैं जो श्री रंगम् के आसपास, तीन से पांच कि.मी. के क्षेत्र में स्थित हैं। इसके अतिरिक्त पलणि में सुब्रह्मण्यम् (भगवान कार्तिकेय) का पर्वतीय क्षेत्र का प्रमुख तीर्थ भी उल्लेखनीय है।

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मदुरै रेलवे लाइन पर त्रिचनापल्ली से 80 कि.मी. दूर ढिंडीगुल रेलवे स्टेशन है। यहां से एक लाइन कोयंबटूर तक जाती है। इस लाइन पर ढिंडीगुल से 65 कि.मी. दूर पलणि स्टेशन है। यहां से श्री रंगम् व अन्य स्थानों को बस, टैक्सी एवं ऑटो मिल जाते हैं।

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R. Singh

Name: Rajesh Kumar Gender: Male Years Of Experience: 15 Years Field Of Expertise: Politics, Culture, Rural Issues, Current Affairs, Health, ETC Qualification: Diploma In Journalism

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