Best Gayatri Sadhana Vidhi : जानिए गायत्री साधना की सही विधि क्या है?
Best Gayatri Sadhana Vidhi: Know what is the correct method of Gayatri Sadhana?

Gayatri Sadhana Vidhi : हमारे आर्ष ग्रन्थों में पवित्र जीवन प्राप्ति के उद्देश्य को महत्ता प्रदान की गयी है। इस क्रम में स्नान-ध्यान -संध्या-वंदना आदि हिन्दुओं के लिए नियत किये गये। इसी व्यवस्था के अन्तर्गत स्नान के उपरान्त आत्मिक पवित्रता के उद्देश्य से गायत्री की ब्रह्म संध्या का विधान किया गया (Brahma Sandhya of Gayatri was established for the purpose of spiritual purity) । आइए हम आपको यह बतायेंगे कि गायत्री की यह ब्रह्म संध्या (This Brahma Sandhya of Gayatri) कैसे की जाती है तथा गायत्री जप (Gayatri Mantra) की प्रक्रिया क्या है?
स्नान आदि से निवृत्त होने के उपरान्त एक साफ़ पात्र लीजिए। इस पात्र में जल भर लीजिए, फि़र यथा शक्ति पुष्प इस जल में मिलाइए। दोनों हाथ की हथेलियों से पकड़ कर लोटे को उठाइए। अब यह मन्त्र पढ़िये-
’’ऊं ए सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय यां भक्त्या गृहाण्यर्घ दिवाकर।।‘‘
उपर्युक्त मन्त्र के स्थान पर गायत्री मंत्र से भी सूर्य को जल का अर्ध्य दिया जा सकता है-
’’ऊं भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यःधीमहि धियो यो नः प्रचोदयात।।‘‘
अब लोटे को उल्टा करके धार की तरह जल भूमि पर गिरायें, और तीन बार गायत्री मन्त्र पढ़ें। प्रातः पूर्व व सायं पश्चिमाभिमुख हो जल दें। अब फि़र लोटे में पवित्र जल भरिये। एकान्त और शान्तिप्रद स्थान पर कुश या ऊन या सूत के बने हुए आसन पर सि)ासन या किसी आराम के आसन में अर्धा, चमची, तश्तरी, कटोरी और अर्ध्य-पात्र आते हैं।
पंचपात्रें के साथ अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प आदि यथा शक्ति पहले से ही रख लेने चाहिए। अब गायत्री की ब्रह्म संध्या की प्रक्रिया आरम्भ होती है। यह संध्या पांच भागों में विभाजित की गयी है-आचमन, शिखा-बन्धन, प्राणायाम, अधमर्षण और न्यास।
आचमन:-
अरघा में जल लीजिए। चमची को बायें हाथ से पकड़कर अरघे में से जल निकालकर दायें हाथ की हथेली पर गिराइए। फि़र- ’’ऊं भूभुर्व: स्वः तत्सवितुर्वरेण्य। भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात।।‘‘ मन्त्र पढ़कर हथेली का जल-पान करें। फि़र लोटे के जल को गिराकर हथेली धोयें। आचमन के अन्तर्गत जल पान की यह क्रिया तीन बार करें।
शिखा बन्धन:-
गायत्री की ब्रह्म संध्या के द्वितीय सोपान के अन्तर्गत शिखा बन्धन की प्रक्रिया आती है। बायें हाथ की अंगुलियों को अरधो के जल से स्पर्श करके दोनो हाथों से शिखा में गांठ लगायें, साथ में गायत्री मन्त्र भी पढ़ें।

प्राणायाम:-
तन-मन शोधन की यह प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। प्रथम श्वास को नासिका के दायें छिद्र से धीरे-धीरे अन्दर खींचें। इस समय दायें हाथ की अंगूठे के पास स्थित तर्जनी से नाक का बांयी छिद्र बन्द रखें। श्वास खींचने के उपरान्त अंगूठे से दायां छिद्र भी बन्द कर दें। श्वास खींचते समय गायत्री मन्त्र मन में तीन बार पढ़ें।
श्वास को अन्दर रोकते समय भी मन्त्र पढ़ते रहें। अब नासिका के बायें छिद्र से अंगुली हटायें और श्वास छोड़ें। साथ में गायत्री मन्त्र भी मन ही मन पढ़ते रहें। प्राणायाम की यह क्रिया तीन बार करनी चाहिए।
अधामर्षण:-
चमची आचमनी से जल लेकर दायें हथेली पर रखें। अब बायें हाथ के अंगूठे से छिद्र से एक से-मी- की दूरी से धीरे-धीरे खीचें, साथ ही यह कल्पना करें कि श्वास के साथ पवित्र जल शरीर के अन्दर प्रवेश कर रहा है जो तन के अन्दर स्थित पापों के सैन्य दल का संहार कर रहा है।
अब बायें हाथ के अंगूठे से दायें नासिका छिद्र को दबाइए और कल्पना कीजिए कि पाप दल मर-कट रहा है। अब हथेली को बायें नासिका छिद्र की सीध में कीजिए और श्वास बाहर निकालिए। यह कल्पना करते जाइए कि पाप की सेना के मृत शव श्वास से होकर हथेली में गिर रहे हैं। अन्त में हथेली का जल अपने बांई ओर गिरा दीजिए। हथेली में जल लेते समय गायत्री मंत्र का उच्चारण करना नहीं भूलना चाहिए। यह क्रिया तीन बार कीजिए।

गायत्री भगवती का आवाहन मंत्र (Gayatri Sadhana Vidhi)
न्यास:- ऊं भूर्भुवः स्वः से सिर का, ऊं तत्सवितु से दोनों नेत्रें का, ऊं वरेण्यं से दोनों कानों का, ऊं भर्गो से मुख का, ऊं देवस्य से कंठ का, ऊं धीमहि से हृदय का, ऊं धियो यो नः से नाभि का, ऊं प्रचोद्यात से दोनों हाथों और दोनों पैरों का स्पर्श कीजिए। अब गायत्री भगवती का आवाहन इस मन्त्र से कीजिए-
ऊं आयातु वरदा देवि अक्षरं ब्रम्हवादिनी।
गायत्री छन्दसां माता ब्रम्हयोनिर्नमोस्तु ते।।
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तत्पश्चात उपलब्ध सामग्री-धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य, पुष्प, चंदन आदि देवी गायत्री भगवती को भक्तिपूर्वक अर्पण करें।
अब बारी आती है गायत्री के शाप विमोचन की। इसका मन्त्र इस प्रकार है-
ऊं अहो देवि महादेवि संध्ये विद्ये सरस्वती।
अजरे अमरे चैव ब्रम्हा योनिर्नमोस्तु ते।
ऊं देवि गायत्री त्वं ब्रह्म शाप विमुक्ता भव।
वशिष्ट शाप विमुक्ता भव। विश्वामित्र शाप विमुक्ता भव।।
साथ में प्रणाम मुद्रा, योनि मुद्रा व प्रणाम मुद्रा क्रमशः प्रदर्शित करनी चाहिए।

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गायत्री हृदय का पाठ (Gayatri Sadhana Vidhi)
इसके बाद गायत्री हृदय का पाठ करना चाहिए-’’ऊं द्यौ मूहिनरंगतास्तेललाटे रूद्र ध्रुवोमध। चक्षुसोश्चन्द्रादित्ये कर्णयो शुक्र-वृहस्पति। नासिके वासुदेवस्यै। दन्तौष्ठव उभौ संध्यै। मुख मग्नि, जिह्वा सरस्वती, ग्रीवायां तु वृहस्पति, स्तर्योर्वसवः, कटि इद्राग्नि। जहने विज्ञानघनः, प्रजापतिः कैलाश मलये उरूः। विश्वेदेवा जानुनि, जन्हुकुशिका जंघाद्वय खुरा: पितराः। पदौ वनस्पतयो, अंगुलयों: रोमाणि नखाश्च मुहुर्तानि गुहाः केतुर्मासः _तवः संवत्सरो निमिषसहोरात्रवादित्यश्चंदमा।‘‘
’’सहस्रपरमां देवि शतमध्यां दशावराम।
सहस्रनेत्रं गायत्री शरणमंह प्रमद्ये।।
तत्पश्चात गायत्री भगवती को 24 मुद्रायें प्रदर्शित कर जप आरम्भ कर देना चाहिए। जप समाप्ति के बाद गायत्री कवच आदि का पाठ कर गायत्री का विसर्जन इस मन्त्र से करना चाहिए-
’’ऊं उत्तमे शिखरे देवि,
भम्यां पर्वत मूध्नि।
ब्रम्हणेभ्यो अनुज्ञाता गच्छ देवि गथा-सुखम।‘‘
इस प्रकार गायत्री की साधना का विधान किया गया है, जो आत्मिक उन्नति का स्रोत कहा जा सकता है।



