Teeth Treatment : ऑर्थोडोंटिक्स से होता है टेढ़े-मेढ़े दांतों का इलाज
इस आलेख में आईये जानते है कैसे आप दांत सुंदर व स्वस्थ्य रख सकते है

Teeth Treatment : आपके चेहरे की सुंदरता के लिए नाक, कान, लिप्स आदि की सही बनावट के साथ-साथ दांतों का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है। आजकल हम जितनी तन्यमता से चेहरे के अन्य अंगों की देखभाल करते हैं शायद उतना अपने दातों का नहीं कर पाते है। सुंदरता के साथ-साथ दांत आपके बोलने व भोजन करने में भी सहायक होते हैं।
इस आलेख में आईये जानते है कैसे आप दांत सुंदर व स्वस्थ्य रख सकते है और यदि दांत टेढ़े-मेढ़े हो तो उसे कैसे सही करवा सकते हैं।
यदि दांत टेढ़े-मेढ़े हैं तो अच्छे खासे चेहरे का सौंदर्य भी जाता रहता है। कभी-कभी लोगों में अपने टेढे-मेढ़े दांतों के कारण एक हीन ग्रंथि भी उपज जाती है जिसका असर उनके पूरे व्यक्तित्व पर पड़ता है। विभिन्न भाषाओं के बहुत से शब्द ऐसे हैं जिनका उच्चारण दांतों के सहारे होता है।
दांतों के अव्यवस्थित होने के कारण बोलचाल में तो रुकावट आती ही है साथ ही खाने-चबाने में भी परेशानियां उत्पन्न हो जाती हैं। साथ ही यदि दांतों में भोजन के कण फंसे पड़े रहते हो तो दांत संबंधी अनेक बिमारियां हो सकती हैं।
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दांतों के अव्यवस्थित होने के कारण कुछ तो प्राकृतिक या जन्मजात होते हैं। परन्तु निजी असावधानियां भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। निजी असावधानियों के कारण भी दांत अव्यवस्थित हो जाते हैं।
ऑर्थोडोंटिक्स चिकित्सा विज्ञान (Orthodontics Medical Science) की वह शाखा है जो दांतों के सौंदर्य संबंधी समस्याओं को निदान करती है। इसके द्वारा दांतों को सुंदर बनाने के साथ-साथ उनकी कार्यकुशलता को भी निखारा जाता है।
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क्यों हो जाते है दांत टेढ़े-मेढ़े (Why do teeth become crooked)
यों तो दांतों का सुव्यवस्थित होना बहुत कुछ प्रकृति निर्धारित करती है परन्तु कुछ बीमारियां भी ऐसी होती हैं जिनसे दांत टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं। क्लींडोक्रोनिफल तथा माइक्राग्लेम ऐसी बीमारियां हैं जिनसे होंठ तथा तालू के साथ-साथ जीभ तथा जबड़े भी प्रभावित होते हैं तथा दांतों का सही विकास नहीं हो पाता। कभी-कभी प्लूरिड ग्रंथियों के बढ़ने से भी ऊपर के जबड़े का सही विकास नहीं हो पाता जिससे दांतों के विकास में रुकावट आती है।

बचपन की गलत आदत (Child Teeth Care)
इनके अतिरिक्त मुंह से सांस लेने, बचपन में अंगूठा या अंगूली चूसने, जीभ चूसने, होठों को चूसने या काटने तथा नाखून काटने जैसी आदतों के चलते भी दांत बाहर आ जाते हैं जोकि देखने में बहुत भद्दे लगते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि बच्चा अंगूठा चूसता है तो उसके ऊपर के दांत और जबड़ा आगे आ जाते हैं। इसी प्रकार होंठ चूसने से ऊपर के दो दांत अव्यवस्थित हो सकते हैं। वहीं दूसरी ओर जीभ काटने से ऊपर और नीचे के दोनों जबड़े प्रभावित होते हैं।
दूध के दांत की भूमिका (The role of milk teeth)
दूध के दांत भी दांतों की व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं यदि दूध के दांत समय के पहले ही गिर जाते हैं तो उस जगह पर जबड़े का ठीक विकास नहीं हो पाता और दांत की वह जगह भी हमेशा के लिए बंद हो जाती है। इसी प्रकार यदि दूध के दांत लंबे समय तक टिके रहते हैं तो स्थाई दांत निश्चित स्थान पर न उगकर इनके आसपास उगते हैं जिससे जीभ और दांतों की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है।

टेढ़े-मेढ़े दांतों का इलाज (Treatment of crooked teeth)
उबड़-खाबड़, टेढ़े-मेढ़े दांतों का इलाज यों तो किसी भी आयु में किया जाता है परन्तु जितना जल्दी इसका इलाज हो उतना अच्छा होता है क्योंकि कम उम्र मेें जबड़े मुलायम रहते हैं जिससे ज्यादा जल्दी ज्यादा अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। इसमें कम से कम एक वर्ष का समय तो लगता ही है। इलाज के अंतर्गत डाॅक्टर कभी-कभी सुधारात्मक तरीके भी अपनाते हैं जैसे व्यक्ति को होंठ या अंगूठे चूसने से रोकना आदि।
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कई बार दांतों के इलाज के लिए तार भी लगाया जाता है। ज्यादातर मामलों में तार अस्थाई तौर पर लगाए जाते हैं परन्तु कुछ मामलों में तार स्थाई तौर पर भी लगाए जाते हैं। इन तारों से दांतों पर दबाव डाला जाता है जिससे कि दांत सही जगह पर व्यवस्थित हो जाएं। गंभीर स्थितियों में विशेष प्रकार के रबर बैंड का प्रयोग भी किया जाता है।
इलाज के बाद क्या नहीं खाएं
ऑर्थोडॉन्टिक्स के इलाज के बाद मरीज को च्वुइंगम, टाॅफी और चाकलेट जैसी चीजें नहीं खानी चाहिएं तथा मीठे और ज्यादा ठंडे खाद्य पदार्थों का प्रयोग भी नहीं करना चाहिए। साथ ही इन मरीजों को सेब, संतरा खाने से भी बचना चाहिए।प्रायः दांतों को उनकी सही जगह पर लाकर छोड़ देना ही काफी नहीं होता। इसके बाद भी इनके सरकने की संभावना बनी रहती है। इसलिए यह जरूरी है कि इलाज खत्म होेने के भी कुछ समय तक डाॅक्टर से सलाह लेते रहें।
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