Tourist Place in Jhajjar : बर्बरीक की तपस्थली माजरा दूबलधन
Tourist Place in Jhajjar: Majra Dubaldhan, the place of penance of Barbarik

Tourist Place in Jhajjar : झज्जर जिले के महाभारतकालीन कस्बे बेरी से 12 किलोमीटर दूर स्थित गांव माजरा दूबलधन में बेरी-दादरी सड़क मार्ग पर एक बड़ा ही मनोहारी सरोवर है-देवालय। इस सरोवर के किनारे अनेक देवी-देवताओं तथा संत-महात्माओं की समाधियां तथा मंदिर बने हुए हैं। इस सरोवर का महाभारत काल से ही विशेष महत्व रहा है। इन्हीं मंदिरों में एक बाबा श्याम का अति प्राचीन मंदिर है।
माना जाता है कि यह मंदिर धर्मराज पांडु पुत्र युधिष्ठिर का बनवाया हुआ है तथा महाभारत काल से ही यहां श्याम बाबा का मेला लगता आ रहा है। नवविवाहित जोड़ों व नवजात शिशुओं को मंदिर में आशीर्वाद के लिए अवश्य लाया जाता है। प्रत्येक वर्ष यहां गोविन्द द्वादशी वाले दिन विशाल मेला लगता है जिसमें श्याम के लाखों श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने आते हैं। बताया जाता है कि पांडु पुत्र महाबली भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक ने यहां तपस्या की थी।
भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार एक बार भगवान श्रीकृष्ण अपनी रानी सत्यभामा के साथ द्वारका में बैठे थे। तब इंद्र उनके पास आये और बोले—भगवान भौमासुर (नरकासुर) नामक राक्षस ने मां अदिति के कुंडल, वरुण का छत्र और देवताओं का मणिपर्वत नामक स्थान छीन लिया है।
नरकासुर ने 16 हजार कन्याओं का अपहरण कर उन्हें बंदी बना लिया। तब श्रीकृष्ण सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर नरकासुर की राजधानी प्रागज्योतिषापुर में नरकासुर का वध करके मां अदिति के कुंडल लेने पहुंच गये। नरकासुर का सेनापति था राक्षसराज मोर, जिसके सात पुत्र तथा एक पुत्री थी मोरवी। मोरवी वीरांगना तथा विदुषी थी। मोरवी ने प्रागज्योतिषपुर की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था कर रखी थी।
भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर की सारी सुरक्षा व्यवस्था चौपट कर दी। उन्होंने मोर तथा उसके सातों पुत्रों को मार डाला। अंत में नरकासुर का वध कर डाला तथा 16 हजार कन्याओं को बंदीगृह से छुड़वाया। मां अदिति के कुंडल ववरुण का छत्र उन्हें वापस कर दिया।
राक्षसराज मोर की पुत्री मोरवी से महाबली भीम के अति बलशाली पुत्र घटोत्कच की शादी करवा दी। घटोत्कच मोरवी को अपनी मां हिडिम्बा के पास ले आया। घटोत्कच को मोरवी से अति बलशाली पुत्र की प्राप्ति हुई। सारे शरीर पर सिंह जैसे बाल होने के कारण बालक का नाम बर्बरीक रखा गया।
जब वह सात वर्ष का हो गया तो घटोत्कच उसे द्वारका भगवान श्रीकृष्ण के पास लाया और उसकी शिक्षा और कल्याण का मार्ग पूछा। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि इसका जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ है इसलिए शक्ति ही कल्याण का मार्ग है। शक्ति को प्रसन्न करने के लिए उसे तपस्या करनी होगी।
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द्वारका से हिमालय की ओर आते हुए बीच में एक स्थान पर जिसके बीच में एक बड़ा सरोवर था, उसे देखकर बर्बरीक ने अपने पिता घटोत्कच से तपस्या करने की आज्ञा मांगी। पास में ही दुर्वासा ऋषि का आश्रम था। उस गुप्त स्थान (माजरा दूबलधन) में रहकर बर्बरीक ने छह साल तपस्या की। घोर तपस्या देखकर देवियों ने बर्बरीक को अतुलनीय बल का वरदान दिया।
महाभारत युद्ध में बर्बरीक भी देवियों द्वारा दिए गए तीनों बाणों और धनुष के साथ नीले घोड़े पर सवार हो कुरुक्षेत्र की ओर महायुद्ध देखने के लिए चल पड़ा। कुरुक्षेत्र पहुंचकर बर्बरीक ने एक पीपल के पेड़ के नीचे अपना डेरा जमाया ही था कि इतने में श्रीकृष्ण दौड़ते हुए उसके पास पहुंचे तथा पूछा-‘वत्स! तुम कौन हो? किसकी ओर से युद्ध में भाग लेने आये हो?’ बर्बरीक ने कहा, ‘प्रभु! मुझे किसी का निमंत्रण नहीं मिला। मां जग-जननी से वचनबद्ध होने के कारण मैं उसके पक्ष में युद्ध करूंगा जो हारता नजर आयेगा।’
शीश दान में मांग लिया
भगवान ने सोचा देवियों को दिए वचनानुसार बर्बरीक उस पक्ष की ओर से युद्ध करने लग जायेगा, जो हारता नजर आयेगा। इस तरह इस युद्ध में न तो पांडव ही बचेंगे और न ही कौरव। यह सोचते हुए भगवान बर्बरीक से बोले, ‘वत्स! तुम वीर तो हो पर दानी नहीं?’ बर्बरीक ने कहा, ‘प्रभु! मैं जितना वीर हूं, उतना ही दानी भी हूं।’ इतना सुनते ही भगवान श्रीकृष्ण ने उसका शीश दान में मांग लिया। बर्बरीक ने कहा, ‘प्रभु! मैं तो महाभारत युद्ध देखने आया था, शीश कट गया तो युद्ध कैसे देखूंगा?’
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि तुम युद्ध ही नहीं देखोगे बल्कि इस युद्ध के निर्णायक भी तुम्हीं होंगे। इतना सुनते ही बर्बरीक ने अपना शीश काटकर भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया। प्रभु ने बर्बरीक के शीश को उसी पीपल के पेड़ के पास अंतरिक्ष में स्थिर कर दिया जिसके सभी पत्तों को बींध कर बर्बरीक ने भगवान श्रीकृष्ण को अपनी शक्ति का अहसास कराया था।
बर्बरीक ने पांडवों को सच्चाई का अहसास करवाया
अंत में जब पांडवों ने युद्ध जीता तो उनके मन में शक्तिशाली होने का दंभ घर कर गया था। बर्बरीक ने यह कहकर पांडवों को सच्चाई का अहसास करवाया कि उसने तो महाभारत के युद्ध में केवल सुदर्शन चक्र और श्रीकृष्ण की नीति को चलते देखा था। तब वासुदेव श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को कहा था कि उसके भक्त बर्बरीक की भविष्य में उनके नाम यानी ‘श्याम बाबा’ के नाम से आराधना की जाएगी।
पांडव बर्बरीक के शीश को हिमालय पर्वत पर ले जा रहे थे तो रास्ते में कमरुनाग (मंडी, हिमाचल प्रदेश) नामक स्थान पर वह हिमकन्या को देखकर उस पर मोहित हो गया। पांडवों ने बर्बरीक के शीश की वहीं प्राणप्रतिष्ठा की और वापस कुरुक्षेत्र आ गये। इन्द्रप्रस्थ जाते हुए धर्मराज युधिष्ठिर ने माजरा दूबलधन में, जहां बर्बरीक ने दैवीय सिद्धि प्राप्त की थी, उसके धड़ की अन्त्येष्टि की तथा मंदिर भी बनवाया। इस मंदिर के अवशेष आज विलुप्त हो चुके हैं। आज तक कौशिक गोत्रीय ब्राह्मण ही अपने कुलदेवता की पूजा-अर्चना व देखरेख करते आ रहे हैं। फाल्गुण मास की एकादशी-द्वादशी को यहां विशाल मेला लगता है।



