दुनिया की लाखों जिन्दगियोंं में जहर घोलता अकेलापन

Loneliness poisons millions of lives around the world

Loneliness poisons millions of lives around the world
Loneliness poisons millions of lives around the world

‘हर छठा व्यक्ति अकेला है’-यह निष्कर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की ताज़ा रिपोर्ट का है, जिसने पूरी दुनिया को चिन्ता में डाला है एवं सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर हम कैसी समाज-संरचना कर रहे हैं, जो इंसान को अकेला बना रही है। निश्चित ही बढ़ता अकेलापन कोई साधारण सामाजिक, पारिवारिक एवं व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि एक ऐसा वैश्विक मानसिक स्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है, जो व्यक्तियों, समाजों, और व्यावसायिक संस्थानों को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है। दुनिया के करोड़ों लोग टूटे रिश्तों व संवादहीनता की स्थितियों में नितांत खामोशी का जीवन जी रहे हैं। गौर करे तो इंसान के भीतर की ये खामोशी लाखों जिंदगियां में महामारी के रूप में जहर घोल रही है। विडंबना यह है कि इस संकट का सबसे ज्यादा शिकार युवा हो रहे हैं। वृद्ध तो पहले से ही सामाजिक एवं पारिवारिक विसंगतियों में उपेक्षित है। निश्चय ही जीवन की विसंगतियां एवं विषमताएं बढ़ी हैं। कई तरह की चुनौतियां सामने हैं। पीढ़ियों के बीच का अंतराल विज्ञान व तकनीक के विस्तार के साथ तेज हुआ है।

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया की लगभग 16 प्रतिशत आबादी आज किसी न किसी रूप में अकेलेपन, सामाजिक अलगाव या भावनात्मक दूरी का शिकार है। यह स्थिति केवल वृद्धजनों तक सीमित नहीं रही, बल्कि युवाओं, कामकाजी पेशेवरों, और यहां तक कि बच्चों तक फैल चुकी है। डिजिटल युग में जहां सब कुछ ‘कनेक्टेड’ लगता है, वहीं इंसानी रिश्तों में एक अदृश्य दूरी, कृत्रिमता और आत्मीयता का अभाव देखने को मिल रहा है। सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में हम जितने अधिक जुड़े हैं, उतने ही भावनात्मक रूप से अकेले हो गए हैं। व्यक्तिवादी सोच, सामाजिक दुष्प्रभाव एवं रिश्तों की बिखरती दीवारों में अकेलेपन का घातक प्रभाव सामाजिक ढांचे पर गहरे रूप में पड़ रहा है। पारिवारिक संबंधों में दरारें, विवाहों में असंतोष, और तलाक की बढ़ती दरें इसकी साफ़ निशानी हैं। युवा पीढ़ी में अवसाद, आत्महत्या की प्रवृत्ति और नशे की ओर झुकाव एक चिंताजनक ट्रेंड बन गया है। बुज़ुर्गों में अकेलेपन से उत्पन्न अल्ज़ाइमर, डिमेंशिया और अन्य मानसिक रोग तेजी से बढ़ रहे हैं।

अकेलापन केवल किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत कमजोरी नहीं है, बल्कि यह समाज की सामूहिक विफलता का संकेत है। जब हम तकनीक, दौड़ और स्वार्थ में इतने उलझ जाते हैं कि किसी के पास “सुनने का समय” नहीं रहता, तब अकेलापन जन्म लेता है। अब समय आ गया है कि हम फिर से रिश्तों, संवाद और करुणा की दुनिया की ओर लौटें। अन्यथा अकेलापन, उदासी और असंतुष्टि की भावनाएं कचोटती रहेगी। मानो खुद के होने का एहसास, कोई इच्छा ही ना बची हो। तब छोटी-छोटी चीजों में छिपी खूबसूरती नजर ही नहीं आती। ऐसा प्रतीत होता है कि बहुत से लोग जिंदा हैं, पर जीवित होने के जादुई एहसास को कम ही छू पाते हैं। सोच के भौतिकवादी एवं सुविधावादी होने से हमारी आकांक्षाओं का आसमान ऊंचा हुआ है। लेकिन यथार्थ से साम्य न बैठा पाने से कुंठा, हताशा व अवसाद का विस्तार हो रहा है। जिसके चलते निराशा हमें एकाकीपन या अकेले होने की ओर धकेल देती है। निश्चित ही सोशल मीडिया का क्रांतिकारी ढंग से विस्तार हो रहा है। लेकिन इसकी हकीकत आभासी है, कृत्रिम है, दिखावटी है। हर कोई सोशल मीडिया मंचों पर हजारों मित्र होने का दावा करता है, लेकिन ये मित्र कितने संवेदनशील है? कितने करीब है? इन प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक ही है, यथार्थ के जीवन में व्यक्ति बिल्कुल अकेला एवं गुमशुम होता है। आभासी मित्रों का कृत्रिम संवाद हमारी जिंदगी के सवालों का समाधान नहीं दे सकता, अकेलापन दूर नहीं कर सकता। निश्चित रूप से कृत्रिम रिश्ते हमारे वास्तविक रिश्तों के ताने-बाने को मजबूत नहीं कर सकते।

विडंबना यह है कि कृत्रिमताओं के चलते कहीं न कहीं हमारे शब्दों की प्रभावशीलता में भी कमी आई है। जिससे व्यक्ति लगातार एकाकी जीवन की ओर उन्मुख होना लगा है। हमारे संयुक्त परिवारों का बदलता स्वरूप एवं एकल परिवारों का बढ़ता प्रचलन भी इसके मूल में है। पहले घर के बड़े बुजुर्ग किसी झटके या दबाव को सहजता से झेल जाते थे। सब मिल-जुलकर आर्थिक व सामाजिक संकटों का मुकाबला कर लेते थे। लेकिन अब बुजुर्ग एकाकीपन एवं अकेलापन से जूझ रहे है। केरल में इसी तरह के वृद्ध-संकट को महसूस करते हुए वहां की सरकार ने वरिष्ठ नागरिक आयोग बनाया है, जो एक सूझबूझभरा कदम है। आज वृद्धों को अकेलापन, परिवार के सदस्यों द्वारा उपेक्षा, दुर्व्यवहार, तिरस्कार, कटुक्तियां, घर से निकाले जाने का भय या एक छत की तलाश में इधर-उधर भटकने का गम हरदम सालता रहता। वृद्ध समाज इतना कुंठित, अकेला एवं उपेक्षित क्यों है, एक अहम प्रश्न है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं उनकी सरकार अनेक स्वस्थ एवं आदर्श समाज-निर्माण की योजनाओं को आकार देने में जुटी है, उन्हें वृद्धों को अकेलेपन को लेकर भी चिन्तन करते हुए वृद्ध-कल्याण योजनाओं को लागू करना चाहिए, ताकि वृद्धों की प्रतिभा, कौशल एवं अनुभवों का नये भारत-सशक्त भारत के निर्माण में समुचित उपयोग हो सके एवं आजादी के अमृतकाल में अकेलापन एक त्रासदी न बन सके।

कामकाजी परिस्थितियों का लगातार जटिल होना एवं महंगी होती जीवनशैली ने अकेलापन के संकट को गहरा बनाया है। उन परिवारों में यह स्थिति और जटिल है, जहां पति-पत्नी दोनों कामकाजी हैं और बच्चे हॉस्टलों व बोर्डिंग स्कूल में रह रहे हैं। व्यावसायिक क्षेत्रों में भी काम का बोझ इंसानों को अकेला बना रहा है। कार्यालयों और कार्यस्थलों पर भी अकेलापन एक गंभीर चुनौती बन रहा है। कर्मचारी भावनात्मक जुड़ाव की कमी के कारण कार्य में रुचि नहीं लेते। टीम वर्क, इनोवेशन और सहयोग पर इसका नकारात्मक असर पड़ता है। अकेलापन लंबे समय तक बना रहा तो यह बर्नआउट, कार्य से असंतोष और कर्मचारी त्यागपत्र जैसी स्थितियों को जन्म देता है। इससे उत्पादकता में भी गिरावट आती है। मेकिन्से और डेलॉइट जैसी वैश्विक कंसल्टिंग फर्म्स की रिपोर्टें दर्शाती हैं कि अकेलापन कर्मचारियों की उत्पादकता को 15-20 प्रतिशत तक घटा सकता है, जिससे कंपनियों को अरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है। अकेलेपन के इस संकट से निपटने के लिए व्यक्तिगत, सामाजिक और संस्थागत स्तर पर सामूहिक प्रयास ज़रूरी हैं। परिवार, मित्रों और सहयोगियों के साथ समय बिताना ही असली ‘समृद्धि’ है। कंपनियों और संस्थानों में कर्मचारियों की मानसिक और भावनात्मक स्थिति को समझने वाला नेतृत्व चाहिए। डिजिटल संवाद की जगह आमने-सामने संवाद, ‘वर्क फ्रॉम होम’ की जगह ‘वर्क विद कम्युनिटी’ को प्राथमिकता देनी होगी। ऑफिसों और समाज में काउंसलिंग, समूह चर्चा, मेडिटेशन, और योग को प्रोत्साहन दिया जाए। सरकारों को अकेलेपन को एक जनस्वास्थ्य समस्या के रूप में मान्यता देनी चाहिए और सामाजिक समावेश के लिए ठोस कार्यक्रम चलाने चाहिए।

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डब्ल्यूएचओ का वह आंकड़ा भी चौंकाता है कि अकेलापन हर साल तकरीबन आठ लाख लोगों की जीवन लीला समाप्त कर रहा है। जो यह दर्शाता है कि व्यक्ति न केवल समाज व अपने कार्यालयी परिवेश से अलग-थलग हुआ है, बल्कि वह परिवार से भी कटा है। पिछले दिनों देश के शीर्ष उद्योगपतियों ने कार्यालयों में काम के घंटे बढ़ाने का आग्रह किया था। एक उद्यमी ने तो यहां तक कहा कि क्या जरूरी है कि घर में रहकर पत्नी का ही चेहरा देखा जाए। यह एक संवेदनहीन एवं बेहूदा प्रतिक्रिया थी। दरअसल, लोगों में यह आम धारणा बलवती हुई है कि जिसके पास पैसा है तो वह सबकुछ कर सकता है। जिसके चलते उसने आस-पड़ोस से लेकर कार्यस्थल पर सीमित पहुंच बनायी है। यही वजह है कि हमारे इर्द-गिर्द की भीड़ और ऑनलाइन जिंदगी के हजारों मित्रों के बावजूद व्यक्ति अकेलेपन को जीने के लिये अभिशप्त है। सही बात ये है कि लोग किसी के कष्ट और मन की पीड़ा के प्रति संवेदनशील व्यवहार नहीं करते। हर तरफ कृत्रिमताओं का बोलबाला है। हमारे मिलने-जुलने वाले त्योहार भी अब दिखावे व कृत्रिम सौगातों की भेंट चढ़ गए हैं। हमें उन कारकों पर मंथन करना होगा, जिनके चलते व्यक्ति निजी जीवन में लगातार अकेला या एकाकी होता जा रहा है। असल में अकेलापन तभी मिटेगा जब हम फिर से इंसान बनेंगे- संवेदनशील, सजीव, संवाद और रिश्तों की गर्माहटत से भरे हुए।

प्रेषकः
(ललित गर्ग)

R. Singh

Name: Rajesh Kumar Gender: Male Years Of Experience: 15 Years Field Of Expertise: Politics, Culture, Rural Issues, Current Affairs, Health, ETC Qualification: Diploma In Journalism

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