कामचोरों और भ्रष्टों की अब खैर नहीं

-तारकेश्वर मिश्र

भ्रष्टाचार पर मोदी सरकार जीरो टॉलरेंस की नीति पर तेजी से आगे बढ़ रही है। धारा 56 के मुताबिक, यदि किसी सरकारी कर्मचारी की उम्र 50 साल या ज्यादा है और वह 20 साल तक नौकरी कर चुका है, तो उसे जबरन रिटायर किया जा सकता है। मोदी सरकार आयकर विभाग और सीमा एवं उत्पाद शुल्क के 27 अधिकारियों और कर्मचारियों को ऐसी सेवानिवृत्ति दे चुकी है। उनमें चीफ आयकर कमिश्नर स्तर के अधिकारी भी थे। आईपीएस के नौ अफसर भी रिटायर किए गए। वे अदालत का दरवाजा भी खटखटा नहीं सकते। अलबत्ता उन्हें पेंशन जरूर मिलती रहेगी। यह दीगर है कि उन अधिकारियों पर कामचोरी के आरोप तो थे ही, लेकिन भ्रष्टाचार के दाग भी थे। मोदी सरकार ने भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ डिपार्टमेंटल प्रोसिडिंग को तेज करने के लिए नया सिस्टम तकरीबन दो साल पहले लागू कर दिया है। जिसे “ऑनलाइन डिपार्टमेंटल प्रोसिडिंग प्रोसेसिंग सिस्टम” नाम दिया गया है। भ्रष्टाचार की गिरफ्त में आए सरकारी अधिकारी की जांच में पहले 8 से 10 साल लग जाता था। लेकिन अब मोदी सरकार ने “ऑनलाइन डिपार्टमेंटल प्रोसिडिंग प्रोसेसिंग सिस्टम” लागू कर दिया है। इस सिस्टम के तहत 2 साल के अंदर ही अधिकारियों के खिलाफ जांच पूरी करनी होगी। जांच में लंबा समय लगने के कारण बेकसूर अधिकारी बेवजह शर्मिंदगी की जिंदगी जीने पर मजबूर रहते थे और कभी-कभी ये शर्मिंदगी आत्महत्या का कारण भी बन जाती थी। लेकिन इस नये सिस्टम से दोषी अधिकारियों पर तुरंत कार्रवाई हो सकेगी और बेकसूर अधिकारियों को जल्द इंसाफ मिलेगा। देश के 19 राज्यों में 110 जगहों पर सीबीआई के करीब 500 अफसरों की टीम ने छापे मारे हैं और 30 केस दर्ज भी किए हैं। अफसरों के घरों और दफ्तरों में छापे मारे गए हैं। इस दौरान सीबीआई ने 455 ग्राम सोना,11 लाख रुपए और बड़ी संख्या में आपत्तिजनक दस्तावेज भी बरामद किए हैं। सीबीआई टीम ने हिमाचल प्रदेश में अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों को दी जाने वाली छात्रवृत्ति में 250 करोड़ रुपए की हेराफेरी के सिलसिले में तलाशी भी ली है। पूरी कार्रवाई की निगरानी खुद सीबीआई निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला कर रहे हैं। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी सरकारी व्यवस्था को साफ करना चाहते हैं। उन्होंने दूसरी पारी का कार्यभार संभालते ही नौकरशाहों को आगाह कर दिया था। ऐसे मामले भी सामने आए थे कि 40-50 साल पुरानी योजनाओं की फाइलें अब भी लटकी हैं।
केंद्र की तर्ज पर उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ एक्शन में नजर आ रही है। हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ऐसे अफसरों ली लिस्ट मांगी है जो अपने कार्यकाल में भ्रष्ट रहे हैं या कामचोर रहे है। हालांकि ये लिस्ट आने में अभी कुछ महीनों का समय लगेगा। योगी सरकार ने पिछले दो सालों में अलग-अलग विभागों में 200 से ज्यादा अफसरों और कर्मचारियों को जबरन रिटायर कर दिया है। इन दो वर्षों में योगी सरकार ने 400 से ज्यादा अफसरों, कर्मचारियों को निलंबन और डिमोशन जैसे दंड भी दिए हैं। इस कार्रवाई के अलावा अभी भी 150 से ज्यादा अधिकारी ऐसे है जो सरकार की रडार पर हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी यूपी सरकार की तर्ज पर भष्ट अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करने जा रहे हैं. उन्होंने अपने कैबिनेट मंत्रियों को ऐसे अधिकारियों की सूची तैयार करने का निर्देश दिया है. खास बात ये है कि इस मामले को लेकर केजरीवाल की दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल से बात हो चुकी है, और दोनों इस मामले पर एकमत हैं।
मध्य प्रदेश में नाकारा अफसरों के दिन अब लदने जा रहे हैं। ऐसे कई अफसरों की सेवाएं भी समाप्त हो सकती है जो काम के प्रति लापरवाह हैं। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने नाकारा अफसरों के लिए नया फैसला लिया है। उन्होंने सरकार के मुख्य सचिव को निर्देश दिए हैं कि उन अफसरों की सूची तैयार की जाए जो कामचोर हैं। सीएम कमलनाथ ने ये सूची 30 दिनों के अंदर मांगी है। राज्य में अफसरों के अच्छे दिन, बुरे दिनों में तब्दील होने वाले हैं। आपको बता दें कि यह किसी फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं बल्कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कामचोर अफसरों की खबर लेने की ठानी है। कमलनाथ में सरकार के मुख्य सचिव को साफ निर्देश दिए हैं कि काम ना कर पाने वाले अफसरों की सूची तैयार की जाए। सीएम कमलनाथ में निर्देश दिए हैं कि काम कर पाने में अक्षम सरकारी अफसरों की 30 दिनों के भीतर समीक्षा की जाए।
कमलनाथ ने आदेश दिये है कि ऐसे अफसरों की पहचान होने बाद जिन अफसरों ने 20 साल की सेवा ली हो या जिन्होंने 50 साल की उम्र पूरी कर ली है, उन पर नियमों के तहत कार्रवाई की जाएगी। मुख्यमंत्री ने मुख्य सचिव को निर्देश दिए हैं और कहा है कि सरकार के हर विभाग में ऐसे कामचोर अधिकारियों की समीक्षा की जाए। यही नहीं मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सख्त निर्देश दिए हैं कि नाकारा अफसरों की सेवा भी समाप्त की जाए। जिससे यह संदेश जाए कि सरकारी कामकाज में भी अब ढील बरतना अफसरों को महंगा पड़ सकता है। फिलहाल यह लिस्ट आने में कुछ दिनों का वक्त लगेगा। पर इससे अफसरों की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रहीं है।
जब अरुण शौरी केंद्र की वाजपेयी सरकार में मंत्री थे, तो कर्मचारियों की कामचोरी के कुछ उदाहरण उनके सामने आए। अरुण शौरी के कार्यालय से एक फाइल भेजी गई, जो 97 दिनों के बाद लौट आई। उसी फाइल को दोबारा चलाया गया, तो छह महीने बाद वह भी लौट आई। दोनों ही बार फाइल पर कोई टिप्पणी नहीं की गई थी। इससे ज्यादा नकारापन और क्या हो सकता है। प्रधानमंत्री मोदी इस संस्कृति को समाप्त करना चाहते हैं और फाइल की आड़ में जो भ्रष्टाचार खेला जाता है, उसकी जड़ भी काट देना चाहते हैं। प्रधानमंत्री का मिशन है कि योजनाएं नकारा कर्मचारियों और भ्रष्ट अफसरों के कारण नहीं लटकेंगी। प्रधानमंत्री का मानना है कि ऐसी छंटनी से सरकारी महकमे साफ तो होंगे, लेकिन उनकी विश्वसनीयता भी स्थापित होगी।
प्रधानमंत्री के ‘मिशन क्लीन’ को राष्ट्रीय आयाम भी दिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में इस मिशन के तहत योगी आदित्यनाथ सरकार ने 600 अफसरों और कर्मचारियों को जबरन रिटायर करने की सिफारिश मोदी सरकार से की है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी मुख्य सचिव से कामचोर और भ्रष्ट कर्मचारियों की सूची मांगी है। बेशक राज्य सरकारें जबरन सेवानिवृत्ति की सूची तैयार करेंगी, लेकिन अंतिम निर्णय मोदी सरकार के स्तर पर ही लिया जाएगा। यह व्यवस्था सवालिया हो सकती है। हर महीने बाबुओं के काम की समीक्षा की जाएगी। मूल्यांकन का आधार क्या होगा और कौन समीक्षक होंगे? वे पूर्वाग्रही भी हो सकते हैं।
हर माह की 15 तारीख तक कामचोर और भ्रष्ट कर्मचारियों की सूची सरकार को देनी होगी। बेशक आगाह किया गया है कि कोई पूर्वाग्रह से निर्णय नहीं करेगा, लेकिन यह तो मानवीय प्रवृत्ति है। प्रधानमंत्री का यह मिशन प्रशंसनीय है, क्योंकि अफसरशाही और दफ्तर के औसत व्यवहार से हम बेहद दुखी और तनावग्रस्त हैं। डीडीए का ही उदाहरण लें और प्रधानमंत्री एक खुफिया छापा उस दफ्तर पर मरवाएं। डीडीए कर्मचारी औसतन बदतमीज हैं। जो काम 60 या 90 दिन में होने हैं, वे दो-तीन साल तक लटके रहते हैं। यदि उनकी जेब गरम कर दी जाए, तो काम तुरंत भी हो जाता है। हमारा यह मानना है कि बेशक यह मिशन व्यवस्था की सफाई के संदर्भ में बेहद ईमानदार है, लेकिन हमारी व्यवस्था, कर्मचारी, अधिकारी मानसिक तौर पर बेईमान और भ्रष्ट हैं। इतनी व्यापक सफाई संभव नहीं है। तथ्य यह भी है कि पेंशन का बजट तनख्वाह के बजट से ज्यादा है, लिहाजा सफाई तो जरूरी है, लेकिन यह किसी आंदोलन से कम नहीं है। देश के आम आदमी की भूमिका भी बेहद महत्त्वपूर्ण है।
-मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार