Chanchal Singh

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चिन्ताजनक है पूंजी का बढ़ता असन्तुलन

New Indian Rupees Currency with a Key

भारत के अमीर और ज्यादा अमीर होते जा रहे हैं, गरीब और ज्यादा गरीब। इस बढ़ती असमानता से उपजी चिंताओं के बीच देश में अरब़पतियों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। भारत के लिये विडम्बनापूर्ण है कि यहां गरीब दो वक्त की रोटी और बच्चों की दवाओं के लिए जूझ रहे हैं, वहीं कुछ अमीरों की संपत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। देश में दसियों नए अरबपति उभरे हैं तो कुछ पुराने अरबपतियों की लुटिया भी डूब गई है। हालांकि अरबपतियों के उभरने की रफ्तार दुनिया में सबसे ज्यादा यहीं है। संपत्ति सलाहकार कंपनी नाइट फ्रैंक की ‘द वेल्थ रिपोर्ट 2019’ के अनुसार भारत में अरबपतियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। 2013 में यह 55 थी जो 2018 में बढ़कर 119 हो गई। फिलाडेल्फिया की टेंपल यूनिवर्सिटी के तहत फॉक्स स्कूल ऑफ बिजनेस के प्रोफेसर चाल्र्स धनराज के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में देश का कारोबारी माहौल लगातार सुधरा है।

एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक साल में भारत में मिलियनेयर क्लब यानी करोड़पतियों के क्लब में भी 7,300 नए जुुड़े हैं। इस तरह देश में करोड़पतियों की तादाद 3.43 लाख हो चुकी है, जिनके पास सामूहिक रूप से करीब 441 लाख करोड़ रुपये की दौलत है। इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि भारत के मात्र नौ अमीरों के पास जितनी संपत्ति है वह देश की आधी आबादी के पास मौजूदा कुल संपत्ति के बराबर है। इस तरह धन एवं संपदा पर कुछ ही लोगों का कब्जा होना, अनेक समस्याओं का कारक हैं, जिनमें बेरोजगारी, भूख, अभाव जैसी समस्याएं हिंसा, युद्ध एवं आतंकवाद का कारण बनी है। अराजकता, भ्रष्टाचार, अनैतिकता को बढ़ावा मिल रहा है।
प्रतिष्ठित बिजनेस पत्रिका फोब्र्स के मुताबिक वर्तमान में दुनियाभर में अरबपतियों की संख्या 1,810 है। फोब्र्स द्वारा नई रिपोर्ट के मुताबिक विश्व के सभी अरबपतियों की कुल संपत्ति लगभग 6.5 ट्रिलियन डॉलर है। अमेरिका में सबसे अधिक अरबपति रहते हैं जबकि भारत सबसे अधिक अरबपतियों वाले देशों की सूची में शीर्ष पांच में शामिल है। भारत में अरबपतियों की संख्या 84 है। फोब्र्स के मुताबिक मुकेश अंबानी भारत के सबसे अमीर आदमी हैं। दुनियाभर में मौजूद गरीब लोगों की 50 फीसदी आबादी की संपत्ति में 11 फीसदी की गिरावट देखी गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की शीर्ष 10 प्रतिशत आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का 77.4 प्रतिशत हिस्सा है। इनमें से सिर्फ एक ही प्रतिशत आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का 51.53 प्रतिशत हिस्सा है। वहीं, करीब 60 प्रतिशत आबादी के पास देश की सिर्फ 4.8 प्रतिशत संपत्ति है। आक्सफैम ने दुनियाभर के राजनीतिक और व्यावसायिक नेताओं से आग्रह किया है कि वे अमीर और गरीब लोगों के बीच बढ़ रही खाई को पाटने के लिए तत्काल कदम उठाएं।
यह चिंताजनक तथ्य है कि गरीब की गरीबी दूर नहीं हो रही। गरीब और अमीर के बीच खाई लगातार चैड़ी होती जा रही है। इस बढ़ती खाई की त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण स्थिति और भी भयावह बनती जा रही है। वास्तव में यह स्थिति है कि करोड़ों लोगों को भरपेट खाने को नहीं मिलता। वे अभाव एवं परेशानियों में जीवन निर्वाह करते हैं। वह तो मरने के लिये भी स्वतंत्र नहीं है और गरीबी भोगते हुए जिन्दा रहने के लिये अभिशप्त है। यह कैसा सुशासन है? यह कैसी समाज-व्यवस्था है? यह कैसी आर्थिक व्यवस्था है? इस स्थिति को तब तक नहीं बदला जा सकता, जब तक स्वामित्व के सीमाकरण को स्वीकार नहीं किया जाता।
नए भारतीय उद्यमी नये-नये तरीकों से पैसे कमाने के माॅडल लेकर सामने आ रहे हैं, जिनसे पैसा कमाने के बारे में हाल तक कोई सोचता भी नहीं था। कुछ लोग बैंकों से कर्ज लेकर भी मालामाल हुए, कुछ सरकारी फण्ड पर धावा बोला है, कोई जनता के सपनों से खेल रहे हैं, लेकिन ये सफलता के कोई हिट फॉर्मूले नहीं है। इधर उभरे कई स्टार्ट अप्स आने वाले दिनों में पूरी दुनिया की वित्तीय पूंजी के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं। फ्लिपकार्ट इसका अच्छा नमूना है। शिक्षा जैसे क्षेत्र में भी आज बड़े कारोबार की संभावना है, इसे बायजू रवींद्रन ने साबित किया है। इसी तरह डिजिटल पेमेंट एक बड़ी संभावना लेकर उभरा है। विजय शेखर शर्मा की कंपनी की एक इकाई पेटीएम डिजिटल के कारोबार में नोटबन्दी के दौरान जबर्दस्त उछाल आया। ये उपलब्धियां एवं अरबपतियों-करोडपतियों के समूह का बड़ा होते जाना तभी सार्थक है जब गरीब एवं गरीबी पर अंकुश लगे। एक सर्वेक्षण से इस बात का पता चलता है कि सरकारें कैसे स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा जैसी सार्वजनिक सेवाओं पर कम खर्च करके असमानता को बढ़ा रही है। इतना ही नहीं सरकार की नीतियां कंपनियों और अमीरों पर मेहरबान है, वे उन पर कम टैक्स लगा रही है और टैक्स चोरी को रोकने में नाकामयाब भी हो रही है। इससे आर्थिक असमानता बनती जा रही है।
विचारणीय तथ्य तो यह है कि भारत में अमीरों की चांदी उस वक्त में हुई जब देश की अर्थव्यवस्था खस्ताहाली के संकेत दे रही है, औद्योगिक उत्पादन उत्साहवर्धक नहीं रहा, सरकारी और निजी क्षेत्र, दोनों में ही नौकरियां तेजी से खत्म की जा रही हैं और बेरोजगारों की फौज बढ़ती जा रही है। पिछले साल कई महीनों तक रुपया अमेरिकी डाॅलर के मुकाबले कमजोर पड़ा रहा, पेट्रोल-डीजल ने लोगों के पसीने छुड़ा दिए थे और देश का कृषि क्षेत्र और अन्नदाता किसान अपनी बदहाली पर आज भी रो रहा है। देश के युवा सपने चरमरा रहे हैं। इन जटिल हालातों में सवाल है कि अमीरों के इस बढ़ते खजाने पर किसको और क्यों खुश होना चाहिए? ऐसी कौनसी ताकते हंै जो अमीरों को शक्तिशाली बना रही है। गरीबी को मिटाने का दावा करने वाली सरकारें कहीं अमीरों को तो नहीं बढ़ा रही है? जीएसटी एवं नोटबंदी के कारण जटिल हुए हालातों के बीच इन तथाकथित अमीरों की सम्पत्ति का एवं अमीरी का बढ़ना सरकार की नीतियों पर एक सन्देह पैदा करता है।
समस्या दरअसल गरीबी को समाप्त करने की उतनी नहीं, जितनी कि संतुलित समाज रचना को निर्मित करने और मिलने वाले लाभ के न्यायसंगत बंटवारे की है। समृद्धि के कुछ द्वीपों का निर्माण हो भी गया तो कोई देश उनके बूते दीर्घकालीन तरक्की नहीं कर सकेगा। उसके लिए संसाधनों और पूंजीगत लाभ के तार्किक वितरण पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। यदि समय रहते समुचित कदम नहीं उठाए गए तो विषमता की यह खाई और चैड़ी हो सकती है और उससे राजनैतिक व सामाजिक टकराव की नौबत आ सकती है।
दरअसल भारत अब अमीरों की मुट्ठी में है। नीतियां अमीरों के लिए ही बन रही हैं और इनका असर भी साफ नजर आ रहा है। कर्ज लेकर मौज करने वालों की संख्या में इजाफा भी अमीरों की संख्या को बढ़ाता है। ऐसे में गरीबों की तादाद तो बढ़ेगी ही, लेकिन उनकी संपत्ति और ताकत घटेगी। बढ़ती असमानता से उपजी चिंताओं के बीच देश में अरब़पतियों की तादाद का तेजी से बढ़ना खुश होने का नहीं, बल्कि गंभीर चिन्ता का विषय है। गरीबी अमीरी की बढ़ती खाई को पाटकर ही हम देश की अस्मिता एवं अखण्डता को बचा सकते हैं।
इस तरह जब हम देश के सामाजिक और आर्थिक विकास पर नजर डालते हैं तो बड़ी भयानक तस्वीर सामने आती है। आबादी तेजी से बढ़ रही है। महंगाई भी तेजी से बढ़ी है। इन दोनों कारणों से गरीबी भी बढ़ रही है। आज भी देश की आधी से अधिक आबादी को भोजन-वस्त्र के अलावा पानी, बिजली, चिकित्सा सेवा और आवास की न्यूनतम आवश्यकताएं भी उपलब्ध नहीं है। सवाल इस बात का है कि क्या आर्थिक विकास की वर्तमान प्रक्रिया से यह तस्वीर बदल सकती है? हमारी वर्तमान विकास की नीति का लक्ष्य और दर्शन क्या है? इसका दर्शन शिक्षित और आर्थिक दृष्टि से संपन्न वर्ग का दर्शन है। इसका लक्ष्य है कि जितना भी हमारे पास है, उससे अधिक हो, अमीर और ज्यादा अमीर हो।
सारी राजनीति, सारी शिक्षा, सारे विशेषाधिकार शहरी आबादी या कुछ खास धनाढ्य परिवारों तक सीमित हैं। इनमें पूंजीपतियों, व्यापारियों, ठेकेदारों, कारपोरेट प्रबंधकों, सरकारी नौकरशाहों, नेताओं आदि उच्च स्तर के लोगों को गिना जाता है। गैर कानूनी आय और काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था से जुड़ी आबादी भी इनमें शामिल है। इसी कारण बहुत से लोग बेरोजगार हैं या रोजगार की तलाश में हैं। आम जन-जीवन भयभीत करता है। जैसे भय केवल मृत्यु में ही नहीं, जीवन में भी है। ठीक उसी प्रकार भय केवल गरीबी में ही नहीं, अमीरी में भी है। यह भय है आतंक मचाने वालों से, सत्ता का दुरुपयोग करने वालों से है। गरीबी का संबोधन मिटे, तभी हम अरबपतियों के बढ़ते जाने की खुशी मनाने के काबिल होंगे। प्रेषक
(ललित गर्ग)
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