Chanchal Singh

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और क्या-क्या करें एम.जे.अकबर

आर.के.सिन्हा

एम.जे.अकबर ने मीटू कैंपेन में आरोप लगने के कारण केन्द्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। राजनीतिक शुचिता की दृष्टि से यह कुछ हद तक जरूरी भी था। उनकी कुछ पूर्व महिला सहयोगियों ने उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। इस केस में दो बातें गौर करने लायक है। अकबर पर प्रिया रमानी नाम की एक तथाकथित प्रगतिशील महिला पत्रकार ने आरोप लगाए थे। रमानी ने 20 साल पुराने मामले में अकबर पर यौन दुराचार का आरोप लगाया है। लेकिन, जब अकबर ने उनके खिलाफ मानहानि का केस दायर किया तो कुछ लोग बिलखने लगे। क्यों भाई, रमानी जी बीस वर्ष का व्योरा देकर मामले को साफ करें। दूध का दूध और पानी का पानी करें। आरोप लगाना तो अति आसान कार्य है। जब उसे सिद्ध करना है तो वे अकबर साहब को कोर्ट में खड़ा करके जिरह करने से भाग क्यों रही है?

अकबर के अपने बचाव में केस दर्ज करने के बाद ये मीटू कैंपन से जुड़े क्रांतिकारियों ने अब यह कहना शुरू कर दिया कि अकबर अपनी ताकत को दिखा रहे हैं। उन्होंने एक चोटी के वकील को अपने बचाव में रखा है। यानी कोई अपने बचाव में अब वकील भी ना रखे। यानि कि तुम हमें जूते से मरो जी भरके लेकिन, उफ़तककहनेकीछूटनहींहैयहभीकोईबातहुईक्यां? उनकी चार दशकों से ज्यादा की शीर्ष पत्रकारिता क्षेत्र की सेवा धूल में मिला दी जाए, फिर भी वे जुबान ना खोलें। अपना बचाव तक न करें। वे अपना बचाव करना भी चाहें तो उन्हें घेर लिया जाए। ये क्या बात हुई?

अकबर के पत्रकार प्रिया रमानी के खिलाफ मानहानि का केस दायर करते ही सब जगह यह चर्चा होने लगी कि उन्होंने प्रिया के खिलाफ 97 वकीलों की फौज उतार दी है। अकबर साहब ने तो, यह नहीं कहा कि मेरे एक वकील के खिलाफ एक ही वकील उतार सकती हो । एक बार तो कानून की दुनिया से संबंध न रखने वाले लोगों को यही लगा कि अकबर के पक्ष में ही रमानी के खिलाफ 97 वकील लड़ेंगे। पर हकीकत कुछ और ही है। इसे समझ लेना जरूरी होगा। अकबर ने दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में, जो मानहानि का मुकदमा दायर किया है, उसके लिए देश की जानी-मानी लॉ फर्म करंजवाला एंड कंपनी की सेवाएं लीं हैं। उस लॉ फर्म की तरफ से कोर्ट में जो वकालतनामा दायर हुआ है, उसके साथ लॉ फर्म ने जो पेपर दाखिल किया है उसमें फर्म से जुड़े सभी 97 वकीलों के नाम हैं। इसलिए दुष्ट तत्वों द्वारा चौतरफा यह भ्रम फैला दिया गया कि अकबर ने वकीलों की फौज खड़ी कर दी है। यह भी बता दें कि वकालतनामा, वादी या प्रतिवादी की तरफ से कोर्ट में जमा किया जाता है जिसके जरिए कोर्ट को बताया जाता है कि फलां-फलां एडवोकेट मुकदमा लड़ेंगे। सही स्थिति यह है कि इस केस में अकबर के लिए उपर्युक्त लॉ फर्म के छह वकील केस लड़ेंगे जिनमें 4-5 तो जूनियर वकील होते हैं जो एक-या दो सीनियर वकीलों की मदद करते हैं।

अकबर ने रमानी के खिलाफ दायर याचिका में कहा कि वह जानबूझकर और दुर्भावना से ग्रसित होकर उनके खिलाफ ऐसे आरोप लगा रही हैं, जिनका मकसद उनके राजनीतिक कद और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना है। उधर, रमानी के समर्थन में अन्य महिला पत्रकार भी आगे आयी हैं सब की सब मोमबत्ती ब्रिगेड वाली तथाकथित वैसी ही उतरकर हैं जो पत्रकार कम एक्टिविस्टज्यादाहैयहीसबअसहिष्णुताब्रिगेडमेंी बढचढ़ कर हिस्सा ले रही थी।

दामन में दाग

खैर,अकबर ने अपने पद से इस्तीफा दिया तो अब  कहने वाले कह रहे हैं कि उन्हें राज्यसभा की सदस्यता को भी छोड़ देना चाहिए। उन्हें नैतिकता का प्रवचन वे दे रहे हैं, जिनके दामन में दाग ही दाग हैं। मतलब आप किसी से चाहते क्या हो? अकबर ने मीटू के तहत लगे आरोपों के बाद अपने मंत्री पद को छोड़ दिया। क्या मंत्री कोई मामूली पद होता है? उसके बाद वे अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब दे रहे हैं, तो भी आपको ठीक नहीं लग रहा। बात यहीं पर समाप्त नहीं हो रही। अब कुछ वरिष्ठ संपादक और पत्रकार उन्हें सलाह दे रहे हैं कि वे रमानी के खिलाफ दायर आपराधिक अवमानना के मामले को वापस ले लें। क्यों ले लें? आप ले लेते क्या? उनकी इज्जत तार-तार होती रहे और आप उन्हें अपना बचाव करने का भी मौका ना दें। क्या अकबर को देश के किसी अन्य नागरिक की  तरह यह अधिकार भी नहीं हैं कि वे उपलब्ध विधिक राहतों का कानूनी का प्रयोग करें?

एक बिन्दु पर ध्यान देने की जरूरत है। मीटू कैंपन के अंतर्गत विनोद दुआ, नाना पटेकर, आलोक नाथ जैसी शख्सियतों  पर भी यौन उत्पीड़न के आरोप लगे। फिल्ममेकर निष्ठा जैन ने विनोद दुआ पर लगाए अपने आरोपों में कहा कि वो विनोद दुआ से एक बार जब मिली थीं तब वो जामिया मास कम्यूनिकेशन सेंटर से ग्रेजुएशन कर रही थी। उस दौरान वो  नौकरी के लिए इंटरव्यू देने विनोद दुआ के पास गईं थीं। तब विनोद दुआ एक नया शो शुरू होने वाले थे। निष्ठा जैन ने लिखा कि जैसे ही वोइंटरव्यू के लिए बैठीं तभी विनोद दुआ ने एक सैक्सु्अल जोक बोल दिया जिससे वह असहज महसूस करने लगीं और उन्हें गुस्सा भी आया। उन्होंने आगे लिखा किइसके बाद विनोद दुआ ने उनसे सैलरी के बारे में पूछा। जवाब में निष्ठा ने 5 हजार रुपये  पगार मांगी। ये राशि सुनते ही विनोद दुआ ने कहा कितुम्हारी औकात क्या है?” इसके बाद वो रोते हुए बाहर आ गईं।

अकबर पर हल्ला बोलने वाले विनोद दुआ का नाम आते ही अज्ञात वास में चले गए। क्या विनोद दुआ  पर केस नहीं चलना चाहिए? ये कोई नहीं कह रहा है कि विनोद दुआ पर दोष साबित हो गया है। निश्चित रूप से मामला अभी आरोपों के स्तर तक ही सीमित है। लेकिन, लगे हाथ उन पर लग रहे आरोपों की भी जांच करने में क्या बुराई है?इस तरह के आरोप लगते रहें तो कोई भला आदमी किसी औरत को नौकरी पर रखना तो दूर , इंटरव्यू तक में नहीं बुलाएगा। अब रोजगारी और व्यावसायिक योग्यता प्राप्त महिलाएं बताएं कि इससे नुकसान किसका हो रहा है?इन दोनों मामलों पर बारीकी से गौर करें तो चीजें काफी हद तक स्पष्ट होने लगती हैं। समझ में आने लगता है कि अकबर को बलि का बकरा इसलिए बनाया गया, क्योंकि; वे केन्द्र सरकार में मंत्री थे। उन पर हमला करके एक तरह से केन्द्र सरकार पर कीचड़ उछालने की चेष्टा हुई। पर कभी न कभी सच तो सामने आ ही जाएगा। जरा सोचिए कि अगर अकबर पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोप बेबुनियाद निकले तो फिर मीटूब्रिगेडका क्या होगा?

हश्र मीटू का

देखा जाए तो मीटू कैंपेन से एक सुखद संभावना,दूसरी आशंका सामने आ रही हैं। संभावना तो यह लग रही कि अब दफ्तरों में महिला कर्मियों के लिए काम करने की स्थितियां अनुकूल पैदा होंगी। सरकारी और निजी क्षेत्र के दफ्तरों में सड़कछाप हरकतें करने वाले बाज आएंगे। वे दफ्तरों में महिला कर्मियों के  साथ शिष्टाचार के दायरे में संवाद और व्यवहार करेंगे। लेकिन, आशंका यह है कि कहीं मीटू का हश्र दहेज उत्पीड़न कानून की तरह न हो जाये। कौन नहीं जानता कि दहेज विरोधी कानून का जमकर दुरुपयोग हुआ?यूँ कहें कि ज्यादा दुरूपयोग और कम उपयोग हुआ। इस कानून की आड़ में हजारों परिवार बर्बाद हो गये। इसलिए  सर्वोच्च न्यायलय ने इस कानून के दुरुपयोग की आशंका को देखते हुए  पुलिस को निर्देश दिएथे कि वो आरोपियों की गिरफ्तारी में संयम बरते। दरअसल औरतों को जिस कानून से सुरक्षा कवच उपलब्ध कराया गया था, उसी का जमकर दुरुपयोग शुरू कर दिया गया था।

बहरहाल, अब सबसे बड़ी चुनौती ये है कि मीटू कैंपेन का दुरुपयोग ना हो। हालांकि अभी इसकी आशंका दिखाई दे रही है। दुरूपयोग करने वालों को भी तो दंड मिलना वाजिब है !

(लेखक राज्य सभा सदस्य हैं)