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दशहरा काण्ड के दोषियों को सख्त सजा मिलनी चाहिए

शकील सिद्दीकी
अमृतसर में दशहरा ‘जानलेवा’ साबित हुआ। सारी खुश्यिां और उत्साह भारी गम में तब्दील हो गया। हादसे में करीब 61 मासूम लोग मारे गए और इससे ज्यादा घायल हुए। हादसे के बाद रेलवे ट्रैक पर आधा किलोमीटर तक लाशें बिखरी पड़ी थीं, इस नजारे के बारे में सोचकर भी आत्मा कांप उठती है। अमृतसर का यह रेल हादसा कोई सामान्य या तकनीकी नहीं माना जा सकता। यह निश्चित तौर पर एक ‘नरसंहार’ था, बेशक कोई कबूल न करे। टेªन अपनी गति से गुजरीं, लेकिन मानवीय जिंदगियों को लीलती हुईं! चूंकि स्थानीय प्रशासन, रेल प्रबंधन, दशहरा आयोजन की कमेटियां बीते कुछ सालों से देखती रही हैं कि रेलवे टैªक पर चढ़कर भीड़ का एक हिस्सा दशहरा और रावण दहन देखता था। आखिर ऐसे आयोजनों को इजाजत कौन और कैसे देता रहा था?
क्या अधिकारियों की आंखें बंद रहती थी या वे विवश थे? दशहरा मैदान कहीं खुली, सुरक्षित जगह पर स्थानांतरित किया जा सकता था। कोई पार्षद हो या विधायक, मंत्री ऐसे अवैध आयोजन कराए, उन्हें भी इजाजत क्यों दी गई? आखिर आईएएस, आईपीएस और पुलिस बल मोटी-मोटी तनख्वाहों के साथ तैनात किसलिए हैं? क्या सत्ता की जी-हुजूरी के लिए! भीड़ तो निरंकुश होती है। उत्सव के मौके पर कुछ उच्छृंखल भी हो जाती है। भीड़ को नियंत्रित करने और तमाम पुख्ता इंतजाम करने का दायित्व किसका है?
रेलवे न तो इस हादसे की जांच की भी जरूरत नहीं समझती। मृतकों के परिजनों को पांच लाख रुपए मुआवजा देने का ऐलान करने वाले पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिंह ने जरूर मजिस्ट्रेट से जांच कराने की बात कही है। यह पहला हादसा नहीं है, जिसमें मुआवजा दिया जाएगा या जांच होगी, पर असल सवाल सबक सीखने का है, जो कभी न सीखना हमारे समाज और सरकार की फितरत बन चुकी है। अमृतसर के दर्दनाक दशहरा की ही बात करें तो कई बातें दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ हैं, जो जांच के बजाय कार्रवाई और सबक सीखने की जरूरत बताती हैं। ऐसे दर्दनाक हादसों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, पर कड़वा सच तो यही है कि हमारे देश में सबसे ज्यादा राजनीति ही तो होती है। फिर भी बड़बोले मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर की यह जवाबदेही तो बनती ही है कि वह हादसे को आमंत्रित करते रावण दहन समारोह की मुख्य अतिथि बनीं। आलोचक यह भी कह सकते हैं कि अगर नवजोत समय से आ गई होतीं तो रावण दहन समय से यानी रेल आने से पहले हो जाता, और शायद हादसा भी नहीं होता। देश भर में विधायक से लेकर पीएम तक रावण दहन के लिए पहुंचते हैं, इसका तार्किक सम्बन्ध समझ से परे है।
दरअसल ये जिंदगियां बचाई जा सकती थीं। बेशक ट्रेन के ड्राइवरों की लापरवाही को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन वहीं गेटमैन की भूमिका भी अहम थी। वह लोगों की जान बचा सकता था। रेलवे विशेषज्ञों का कहना है कि जिस रेलवे क्रॉसिंग के पास हादसा हुआ, वहां दशहरे का मेला 6 साल से लग रहा था। इसकी जानकारी रेलवे के स्थानीय प्रशासन, स्टेशन मास्टर, गेटमैन और वहां से गुजरने वाली टेªन के ड्राइवरों को जरूर होगी। गेटमैन साक्षी था कि लोग टैªक पर खड़े होकर मेले के वीडियो बना रहे थे। इसके बावजूद उसने मैग्नेटो फोन से स्टेशन मास्टर को जानकारी नहीं दी, लिहाजा गुजरने वाली ट्रैनों की गति कम करने के आदेश नहीं दिए जा सके।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि दशहरे जैसे समारोह की जानकारी स्थानीय प्रशासन को रेलवे को देनी होती है। उससे टैªक के आसपास बैरिकेड लगाए जाते हैं, आरपीएफ के जवान तैनात किए जाते हैं और टेªन के आने का समय घोषित किया जाता है। बिहार में तो सभी मंदिर रेलवे टैªक के किनारे हैं, वहां ऐसे इंतजाम हर साल किए जाते हैं, लेकिन लापरवाही सभी ने की होगी, नतीजतन इतना भयावह और हत्यारा हादसा हुआ। ऐसे ही हादसे बिहार और आंध्रप्रदेश में हो चुके हैं, लेकिन उनसे भी कोई सबक नहीं सीखा गया।
सवाल यह भी अनुत्तरित है कि अगर स्वनामधन्य पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों ने ऐसे आत्मघाती आयोजन की अनुमति दी थी तो एहतियात बरतने के लिए रेलवे को सूचना देने की जहमत क्यों नहीं उठाई? यह सही है कि ट्रेन अचानक ब्रेक लगाकर नहीं रोकी जा सकती, पर क्या ड्राइवर को जलते हुए रावण की रोशनी और धुआं बिल्कुल दिखाई नहीं दिया? ऐसा दिखने पर ट्रेन पहले से ही धीमी जरूर की जा सकती थी। तब शायद ऐसे दर्दनाक हादसे से बचा जा सकता था। कार्रवाई आयोजन समिति के खिलाफ भी होनी चाहिए, जिसने ऐसे खतरनाक स्थल को आयोजन के लिए चुना। आखिरी, और शायद सबसे जरूरी सवाल यह है कि समाज के रूप में हम इतने जागरूक कब बनेंगे कि रेल की पटरियां तमाशा देखने के लिए नहीं हैं?
बहरहाल यह भी देखा गया है कि अकसर पुतले दहन के समय का भी पालन नहीं किया जाता और नेतागण अपने भाषण पेलने में मस्त रहते हैं। इस त्रासदी के लिए वे भी जिम्मेदार हैं। मौजूदा संदर्भ में पंजाब सरकार के स्थानीय निकाय मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी को ‘खलनायक’ करार दिया जा रहा है। उन पर कई सवाल हैं। न्यायिक जांच उनसे पूछेगी या नहीं, यह भी अपने आप में एक सवाल है। बहरहाल जितनी व्यापक क्षति हुई है, उसकी भरपाई सरकार के 5-7 लाख रुपए कभी भी नहीं कर सकते। न जाने कितने ही परिवार अनाथ हो गए होंगे, न जाने कितने ही उभरते, योग्य भविष्य सदा के लिए मिट गए होंगे। ज्यादातर मौतें बिहार और उप्र के लोगों की हुईं, जो प्रवासी मजदूर होंगे। क्या नियति ऐसी ही मौतों के लिए तय थी?
अब जबकि स्थानीय प्रशासन ने रेलवे ट्रैक के निकट रावण दहन की अनुमति देने की बात स्वीकार कर ली है, तब क्या संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे ऐसे अदूरदर्शी पुलिस-प्रशासनिक अधिकारी सिर्फ हादसों और अपराध को ही अंजाम दे सकते हैं। कुछ तो आयोजकों की लापरवाही और कुछ रेलवे की असतर्कता के नतीजे के कारण यह घटना हुई. लोग भी सतर्क नहीं थे। उन्हें रेलवे ट्रैक पर खड़ा नहीं होना चाहिए था।
अब एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति चालू हो गयी है, यह और भी दुखद है। जहां एक तरफ क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू से इस घटना पर संवेदना की अपेक्षा थी, वहीं उनका यह बयान कि यह घटना कुदरत का कहर है, और भी दुखी कर गया। राजनेताओं को ऐसे बयान से बचना चाहिए। आपराधिक लापरवाही से जो जिंदगियां काल कवलित हो गईं, उन्हें वापस नहीं लाया जा सकता, पर ऐसे हादसों की पुनरावत्ति से बचने के लिए भी जरूरी है कि सही कारणों का पता चले और जिम्मेदारी तय हो। इसके लिए रेलवे को भी जांच से मुंह नहीं चुराना चाहिए। मकसद केंद्र और राज्य में परस्पर विरोधी दलों की सरकारों में दोषारोपण नहीं, बल्कि एक बेहतर और सुरक्षित समाज बनाना होना चाहिए। इस घटना से सीख लेते हुए कोशिश यह होनी चाहिए कि कभी भी भीड़ एकत्रित करने वाले आयोजन रेलवे ट्रैक, सड़क आदि के किनारे नहीं करने चाहिए

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