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मनु की पुत्री के नाम से बसा था इल्हावास ,अकबर ने किया इलहाबाद     

डा. महताब अमरोहवी 
मनु की पुत्री  इला का नगर है इलावास उर्फ इलाहाबाद !  संसार में बेटी के नाम पर बसा लगभग अकेला नगर है इलावास, जिसका नाम अकबर ने कम बदला , आधुनिक अकबरों एवं उन  के साथियों ने पूरा बदल दिया। इलावास नाम इलाहाबाद नगर के लिए प्रयाग से प्राचीन है ,इलाहाबाद अंचल में यह भी मान्यता है कि पुरुरवा ऐल यानी इलापुत्र ने माँ के नाम पर बसाया। अंतिम रूप से बेटी या माँ के नाम पर आबाद हुआ नगर है इलाहाबाद।प्रयाग के साथ कोसम और कौशाम्बी लगातार मिलते हैं। लेकिन इलावास के साथ और नाम नहीं मिलते। इलाहाबाद में इला का अवशेष चिपका था।रामायण के अनुसार प्रयाग केवल वन था। जहाँ इक्के दुक्के मुनि रहते थे। आबाद बस्ती इलावास थी। यह चंद्रवंशी सम्राट पुरु की राजधानी थी। इनके पूर्वज पुरुरवा थे। जो मनु की पुत्री इला और बुध के पुत्र थे। मनु की पुत्री इला के नाम पर ही प्रयाग के इर्द गिर्द के क्षेत्र को इलावास कहा जाता था। पौराणिक साहित्य में प्रयाग कभी नगर नहीं रहा। वह सदैव वन और जंगल था। और गंगा जमुना का संगम था। सरस्वती के मेल से त्रिवेणी की संकल्पना मध्यकालीन है।प्रतिष्ठान पुरी जो कि आजकल झूंसी के नाम से अधिक ख्यात है, वह राजधानी थी। वहाँ मनु दुहिता इला का वास था। संसार का शायद पहला नगर हो इलावास जो बेटी के नाम पर बसा।मैं जोर देकर कहना चाहता हूँ कि बेटी के नाम पर बसे नगर इलावास का नाम प्रयाग रखना सरकार के बेटी विरोधी चरित्र का प्रमाण है। इलाही से नफरत में अंधे लोग बेटी इला या माँ इला की स्मृति को स्वाहा कर रहे हैं। ऐसे ही दिल्ली यानी इंद्रप्रस्थ का नामकरण नया है। इंद्रप्रस्थ से पहले उस भूक्षेत्र का नाम खाण्डवप्रस्थ सप्रमाण प्राप्त है। जो पाण्डवों के पूर्वजों और नागों के बीच एक विवादित क्षेत्र था। वहाँ वनवासी नाग काबिज थे। जिन्हें घोर क्रूरता से कृष्णार्जुन ने मारा उजाड़ा जलाया और भगाया। तो अब यदि दिल्ली का नाम बदला जाए तो इंद्रप्रस्थ किया जाए या खाण्डवप्रस्थ?और कंस की मथुरा पहले  मधुपुर थी जो दैत्य लवणासुर की राजधानी थी। क्या उसका नाम बदला जाए और लवणासुर की स्मृति में उसका नाम मधुपुर रखा जाए।बदलाव और अधिकार में किसका पहला हक होगा। इलाहाबाद पर बेटी इला का, इंद्रप्रस्थ पर नागों का या मथुरा के मूलवासी असुरों का, अलीगढ़ का मूल नाम कोल था , भुवनेश्वर पहले विन्दु सरोवर था, गिरनार रैवत गिरि था, आजका एरण कभी एरंगकिना था, एलिफेंटा धारापुरी था, द्वारका कुशावर्त था, हमें तय करना होगा क्या-क्या और कैसे-कैसे और कब-कब बदला जाएगा। क्या हर समय एक नामांतरण  का सिलसिला बना रहेगा। कितना समाजवादी बदलेंगे। कितना मायावादी, कितना आस्थावादी यह एक साथ तय हो, और देश बदलाव से मुक्ति पाकर आगे जाए और बदलना है तो भारत देश को उसके अंग्रेजी नाम से मुक्ति दिलाएं। भारत के जितने पुराने नाम हैं उनमें से एक तय करें। शकुंतला नंदन भरत के  पहले  भी तो यह भूभाग था। वह नाम तो भारत नहीं था। कृपा करें भारत को उसका असली नाम दें। उसके माथे से इंडिया का मुकुट या मैल जो भी है उसे हटाएं।नाम बदलने के कुचक्र को जल्दी रोका जाए। यह एक सरल सा प्रस्ताव है। इस पर विचार होना चाहिए |  वैसे तो इलावास से इलहाबाद शहर के वास्तविक संस्थापक थे सम्राट अकबर !इलाहाबाद शहर के मूल संस्थापक अकबर थे। अकबर की देन से इलाहाबाद आज भी जिंदा है। मैं इलाहाबादियों से पूछता हूँ आज भी गंगा यमुना की बाढ़ से शहर को कौन बचाता है। अगर अकबर का बनवाया बांध न हो तो आज भी इलाहाबाद का अस्तित्व एक बरसात ही में खतरे में पड़ सकता  है।जो इलाहाबाद को जानते हैं मैं उनसे पूछता हूँ अकबर के बांध के पहले इलाहाबाद में आबादी की संभावना कैसे रही होगी। कछार के धरातल से भी नीचे है अल्लापुर अलोपीबाग बैरहना और तुला राम बाग टैगोर टाउन का धरातल। सिविललाइंस कटरा और मम्फोर्डगंज का कुछ हिस्सा ऊँचा है। भारद्धाज आश्रम और आनंद भवन के आसपास भी कुछ ऊँचे भूभाग है। यहाँ तब भी मुनियों के आश्रम रहे होंगे। लेकिन आबादी का कहीं कोई उल्लेख  नहीं है। इलाहाबाद वालों जो आपको दो महान नदियों की बाढ़ की विभीषिका से बचाता है वह निर्माण हुमायूँ के पुत्र अकबर का है। दारागंज से एलनगंज के बीच लगभग दो  किलोमीटर का बांधहै  जिसे आप अब केवल बांधरोड कहते हो।अकबर के पहले के मध्यकाल में उस इलाके में शासन और सत्ता के केन्द्र कड़ा मानिकपुर जौनपुर और चुनार थे। अकबर ने संगम पर एक मजबूत किला बनवाकर कड़ा और कोसम की जगह जंगलों और डूब वाली भूमि पर एक नगर बसा कर यह सब  संभव किया।जिसे भी मेरी इस स्थापना पर आपत्ति हो वह बताए कि बांधों का चौतरफा घेरा जब न था तो गंगा का पानी बघाड़ा वाले कछार से शहर में दाखिल होने से कौन रोकता था ?आप नाम बदलो, हारे हुए लोगों और उनके नगरों के नाम बदले जाने की एक सामंती परम्परा रही  है लेकिन अकबर ने काशी, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, उज्जैन, विन्ध्याचल, मैहर, चित्रकूट इन बड़े तीर्थों के नाम क्यों नहीं बदले? अगर किसी धर्म विशेष  को नीचा दिखाना होता तो ये बदलाव व्यापक प्रभाव डालते? रोचक बात है कि किसी नदी का नाम नहीं बदला गया। किसी पहाड़ किसी झरने का नाम नहीं बदला गया। पूरे मुगल सरकार में ! गंगा ,यमुना, सरयू ,चंबल ,केन ,बेतवा ,बरुणा, गंडक ,सोन, घाघरा, व्यास झेलम, रावी, सिंध ,चिनाब , सतुलज , जम्मू तवी किसी भी  नदी नाले का नाम नहीं बदला। हिमालय, हरिद्वार से पानी मंगाकर पीता रहा अकबर!
कितने अदूरदर्शी  थे मुगल? अकबर तो पूरा मूर्ख था सूर्यसह्रनाम रटने में लगा था, टोडरमल खत्री ,बीरबल पाण्डे, मानसिंह कछवाहा को नवरत्न बनाकर सरकार चलाता रहा। हिन्दुओं  भावनाओ का सम्मान करते हुए उन के प्रिय भगवान राम और सीता के नाम पर सिक्के जारी करना यह बताता है कि पर किसी समुदाय  के समूल नाश की मानसिक औकात नहीं थी उसमें और उसका नवरत्न मानसिंह बरसाने में राधा रानी का मंदिर बनवाता रहा। सरकार की नाक के नीचे ,और अकबर तानसेन से रागरागिनी सुनता रहा।
तुलसीदास राम का चरित गाते रहे उसके शासन में? सूर की कृष्ण लीला वृंदावन में चलती रही? पूरी भक्ति कविता गाई गई उस अकबर की सरकार में? उसे रोकना होता तो यह साहित्य सृजन रोकना था  उल्टे उसका एक प्रिय सिपहसालार कवि रहीम तो वैष्णव ही  हो गया, पुष्टि मार्ग का अनुयायी! बीस भाषाओं का ज्ञानी  फारसी, तुर्की, अरबी ,संस्कृत का प्रकांड पंडित होकर ब्रज में बरवै और नीति के दोहे रचता रहा ,हारे लोगों की भाषा संस्कृति से प्रेम करने वाले मूर्ख थे सब, रहीम को फारसी से हिलना नहीं था और तुलसी सूर कुम्भन सबको दो थप्पड़ लगा कर आगरे से लेकर अगरोहा तक कहीं कैद रखना एक अपराजेय सम्राट के लिए इतना कठिन काम तो न रहा होगा। उसे जौनपुर में पुल नहीं बनवाना था। बस जौना शाह की जगह हर नये पुराने निर्माण को अकबर द्वारा तामीर किया गया की मुनादी करवानी थी।लेकिन तब उसके देहांत  पर जौनपुर, इलाहाबाद, मिर्जापुर , बनारस शोक में न डूबते, यहाँ के बाजार हफ्तों अपने शहंशाह के जाने का मातम न मनाते, आप अकबर के संस्थापित शहर का नाम बदलो, लेकिन जन के मन से खुरच खुरच कर अकबर को मिटाने की क्या तरकीब निकालोगे? उस अकबर का क्या बिगाड़ो जिस ने कभी जोधा बाई की आरती की थाली कके सामने झुकाया ?उस अकबर को कैसे मिटाओगे जो आज भी  इतिहास की पुस्तकों और न्याय प्रिय लोगों के दिलों में आज भी महान है |


(बोधिसत्व, हिंदी के चर्चित कवि हैं। मुंबई में रहते हैं, लेकिन लंबा समय इलाहाबाद में गुज़ारा है। इलाहाबाद विश्विविद्यालय के छात्र रहे हैं। इस लेख का कुछ अंश  उनकी फ़ेसबुक दीवार से आभार सहित प्राप्त किया गया हैं | ) 

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